भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ३४ ) अपरोक्षाऽनुभूतिः । सर्वपुरुषएवेति सूक्ते पुरुषसंज्ञिते॥ अ- प्युच्यते यतः श्रुत्या कथं० ॥ ३५ ॥ सं. टी. नकेवलमनयैकया श्रुत्या विनिर्णीतं किंतु- न्ययापीत्याह सर्वमिति । यतो हेतोः श्रुत्या वेदाख्यपरदे- वतया ‘पुरुषएवेदंसर्वम्’ इति पुरुषसंज्ञिते सूक्तेऽप्युच्यते पुरुषलक्षणमिति पूर्वश्लोकादध्याहारः अतः कथं स्या- दितिपूर्ववत् ॥ ३५ ॥ भा. टी. “पुरुष - एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्” इति श्रुतिः।जो कुछ दृष्टिगोचर होयहै सो सब आत्मस्वरूपहै और जो कुछ हुआ और जो कुछ होयगा सर्व आत्मस्वरूप है। इस श्रुतिसे कहा हुआ परमात्मा देहमय किस प्रकार होसकै है ३५ असंगः पुरुषः प्रोक्तो बृहदारण्यके ऽपिच॥अनंतमलसंश्लिष्टः कथं०॥३६॥ सं.टी.अपरयापि श्रुत्यैवमेव निर्णीतमित्याह असंग- इति । “असंगो ह्ययं पुरुषः” इति श्रुत्या बृहदारण्यके वाजसनेयोपनिषदि पुरुषः असंगः प्रोक्तः देहकस्त्वनं- तमलसंश्लिष्टः कथं पुमान्स्यादिति ॥ ३६ ॥ भा. टी, “असंयोगोयंपुरुषः” आत्मा सङ्गहीन है यह बृह दारण्यक उपनिषद्की श्रुति है इस श्रुतिसेभी आत्मा असंग सिद्ध होताहै और देह नानाप्रकारके मलोंकरकै लिपटा हुआ फिर किसप्रकार आत्मा देहमय होसकै है ॥ ३६ ॥