अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ ) अपरोक्षानुभूतिः। इति अव्ययः अपक्षयादिविकारशून्यः अहंकारसाक्षीति भावः ॥ ४० ॥ भा. टी. इसप्रकार आत्मा स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रका रके देहोंसे अलगहै और ईश्वर है सर्वव्यापक है सर्वरूप है सर्वसे अतीतहै ( अर्थात् जिससे परे और कोई नहीं है सबसे श्रेष्ठ है ) अहम्शब्द करके कहा जाय है भूत भविष्यत वर्तमान तीनों कालमें एकरस है ॥ ४० ॥ इत्यात्मदेहभागेन प्रपंचस्यैव सत्य- ता ॥ यथोक्ता तर्कशास्त्रेण ततः किंपु- रुषार्थता ॥ ४१ ॥ सं.टी. अथेदानीमात्मनो देहद्वयातिरिक्तत्वप्रतिपा दनमनर्थकमिति शंकते इतीति । इति पूर्वोक्तप्रकारेण वर्णितेनात्मदेहविभागेन प्रपंचस्यैव सत्यता तथोक्ता यथा तर्कशास्त्रेण ततः प्रपंचसत्यत्वप्रतिपादनात्किंपु रुषार्थता कुत्सितपुरुषार्थत्वं भयनिवृत्त्यभावादित्यर्थः “द्वितीयाद्वै भयं भवति” इति श्रुतेः ॥ ४१ ॥ भा. टी. तर्कशास्त्र अर्थात् न्याय शास्त्रके माननेवालोंने इस आत्मा और देहमें भेदबुद्धिकरके न्याय शास्त्रमें जो प्रप- ञ्चकी सत्यता कही है ( अर्थात् परमाणुको नित्य मानकर ईश्वरको निमित्तकारण संसारकी उत्पत्ति मानी है ) उसको