भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५१ ) सं. टी. अज्ञानावस्थायां प्रतीयमानो यो जीवब्रह्म- भेदः स नाममात्र इति बहुदृष्टांतैराह यथेति रजतस्य ख्यातिराख्या नामेति यावत् परे परब्रह्मणि जीवशब्द- स्तथा शेषं स्पष्टम् ॥ ६० ॥ भा. टी. अज्ञान अवस्थामें जो जीव ब्रह्मका भेद भासै है सो केवल नाममात्र होय है वस्तुतः मृत्तिका होय परन्तु घट ऐसा नाममात्र होयहै और सुवर्ण होयहै परन्तु कटक कुण्डल ऐसा नाममात्र होयहै सीपी होयहै परन्तु मायावश पुरुष रजत कहने लगे है इसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्म होय है तबभी ब्रह्ममें जीवसंज्ञा होय है सो नाममात्र है वस्तुतः मिथ्या है ॥ ६० ॥ यथैवव्योम्निनीलत्वं यथानीरं मरुस्थ ले ॥ पुरुषत्वं यथास्थाणौ तद्वद्विश्वं चिदात्मनि ॥ ६१ ॥ सं. टी. न केवलं जीव एव नाममात्रः किंतु सर्व्ववि- श्वमपि ब्रह्मणि नाममात्रमित्यनेकदृष्टांतैराह यथैवेति स्पष्टम् ॥ ६१ ॥ भा. टी. केवल जीवही नाममात्र नहींहै किन्तु सम्पूर्ण विश्व- ही नाममात्र है जैसे आकाशमें वस्तुतः कुछ नहीं है परन्तु नीलापन मालूम होयहै और जैसे मारवाड़की भूमिमें वस्तुतः जल नहीं है परन्तु भ्रान्तीसे जल मालूम होय है और जैसे अन्धकार दोषसे रात्रिमें ठूंठ पुरुष मालूम होय है परन्तु वस्तुतः

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