भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ५० ) अपरोक्षानुभूतिः । भा. टी. सतोगुण रजोगुण तमोगुणसे बने हुए जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनो ऊपर कहे हुए प्रकारसे मिथ्या होयहैं इन तीनों अवस्थाओंका साक्षी गुणातीत अर्थात गुणरहित चिन्मय अर्थात् चैतन्य स्वरूप सत्य है ॥ ५८ ॥ यद्वन्मृदि घटभ्रांतिं शुक्तौ वा रज- तस्थितिम् ॥ तद्वद्ब्रह्मणिजीवत्वं वी- क्ष्यमाणे न पश्यति ॥ ५९ ॥ सं. टी. नन्ववस्थात्रयं मिथ्याभवतु जीवस्तु सत्यः स्यादित्याशंक्य सदृष्टांतमुत्तरमाह यद्वदिति ब्रह्मणि वीक्ष्यमाणे आत्मत्वेन साक्षात्कृते सति जीवत्वं न प- श्यतीत्यन्वयः अन्यत्स्पष्टमेव ॥ ५९ ॥ भा. टी. यदि आत्मामें गुणत्रय मिथ्या है तौ जीवही सत्य हो तहां कहै है । जिस प्रकार मृत्तिकामें घटकी भ्रान्ति है परन्तु घट नष्ट होनेपर मृत्तिकाही दृष्टिगोचर होयहै और जैसे शुक्तिमें चांदीकी भ्रान्ति होय है और जब समीपजाके देखै है तों सीपी होयहै इसी प्रकार जबतक आत्माका ज्ञान नहीं होय तब जीव है ऐसी प्रतीति होय है परंतु ब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे जीवको नहीं देखैं है ॥ ५९ ॥ यथामृदि घटोनामकनकेकुण्डलाभि- धा ॥ शुक्तौ हिरजतख्यातिर्जीवशब्द्- स्तथा परे ॥ ६० ॥