अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
( ५० ) अपरोक्षानुभूतिः । भा. टी. सतोगुण रजोगुण तमोगुणसे बने हुए जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनो ऊपर कहे हुए प्रकारसे मिथ्या होयहैं इन तीनों अवस्थाओंका साक्षी गुणातीत अर्थात गुणरहित चिन्मय अर्थात् चैतन्य स्वरूप सत्य है ॥ ५८ ॥ यद्वन्मृदि घटभ्रांतिं शुक्तौ वा रज- तस्थितिम् ॥ तद्वद्ब्रह्मणिजीवत्वं वी- क्ष्यमाणे न पश्यति ॥ ५९ ॥ सं. टी. नन्ववस्थात्रयं मिथ्याभवतु जीवस्तु सत्यः स्यादित्याशंक्य सदृष्टांतमुत्तरमाह यद्वदिति ब्रह्मणि वीक्ष्यमाणे आत्मत्वेन साक्षात्कृते सति जीवत्वं न प- श्यतीत्यन्वयः अन्यत्स्पष्टमेव ॥ ५९ ॥ भा. टी. यदि आत्मामें गुणत्रय मिथ्या है तौ जीवही सत्य हो तहां कहै है । जिस प्रकार मृत्तिकामें घटकी भ्रान्ति है परन्तु घट नष्ट होनेपर मृत्तिकाही दृष्टिगोचर होयहै और जैसे शुक्तिमें चांदीकी भ्रान्ति होय है और जब समीपजाके देखै है तों सीपी होयहै इसी प्रकार जबतक आत्माका ज्ञान नहीं होय तब जीव है ऐसी प्रतीति होय है परंतु ब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे जीवको नहीं देखैं है ॥ ५९ ॥ यथामृदि घटोनामकनकेकुण्डलाभि- धा ॥ शुक्तौ हिरजतख्यातिर्जीवशब्द्- स्तथा परे ॥ ६० ॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५१ ) सं. टी. अज्ञानावस्थायां प्रतीयमानो यो जीवब्रह्म- भेदः स नाममात्र इति बहुदृष्टांतैराह यथेति रजतस्य ख्यातिराख्या नामेति यावत् परे परब्रह्मणि जीवशब्द- स्तथा शेषं स्पष्टम् ॥ ६० ॥ भा. टी. अज्ञान अवस्थामें जो जीव ब्रह्मका भेद भासै है सो केवल नाममात्र होय है वस्तुतः मृत्तिका होय परन्तु घट ऐसा नाममात्र होयहै और सुवर्ण होयहै परन्तु कटक कुण्डल ऐसा नाममात्र होयहै सीपी होयहै परन्तु मायावश पुरुष रजत कहने लगे है इसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्म होय है तबभी ब्रह्ममें जीवसंज्ञा होय है सो नाममात्र है वस्तुतः मिथ्या है ॥ ६० ॥ यथैवव्योम्निनीलत्वं यथानीरं मरुस्थ ले ॥ पुरुषत्वं यथास्थाणौ तद्वद्विश्वं चिदात्मनि ॥ ६१ ॥ सं. टी. न केवलं जीव एव नाममात्रः किंतु सर्व्ववि- श्वमपि ब्रह्मणि नाममात्रमित्यनेकदृष्टांतैराह यथैवेति स्पष्टम् ॥ ६१ ॥ भा. टी. केवल जीवही नाममात्र नहींहै किन्तु सम्पूर्ण विश्व- ही नाममात्र है जैसे आकाशमें वस्तुतः कुछ नहीं है परन्तु नीलापन मालूम होयहै और जैसे मारवाड़की भूमिमें वस्तुतः जल नहीं है परन्तु भ्रान्तीसे जल मालूम होय है और जैसे अन्धकार दोषसे रात्रिमें ठूंठ पुरुष मालूम होय है परन्तु वस्तुतः
( ५२ ) अपरोक्षानुभूतिः । पुरुष है नहीं इसी प्रकार यह संसार परमात्मा ब्रह्मके विषै भिन्न और सत्यसा प्रतीत होय है परन्तु वस्तुतः कुछभी नहीं है ॥ ६१ ॥ यथैवशून्ये वैतालो गंधर्वाणांपुरंयथा ॥ यथाकाशे द्विचंद्रत्वं तद्वत्सत्ये जग- त्स्थितिः ॥ ६२ ॥ सं. टी. नाममात्रप्रपंचस्य मिथ्यात्ववासनादार्ढ्यायै- ममेवार्थं बहुभिर्लोकप्रसिद्धदृष्टांतैः प्रपंचयति यथैवशून्य इत्यादि त्रिभिः शून्ये निर्जने देशे वैतालः अकस्मादा- भासमानो भूतविशेषः गंधर्वपुरस्यापि शून्याधिष्ठानत्वं ज्ञेयं गंधर्वनगरं नाम राजनगराकारो नीलपीतादिमेघर- चनाविशेषः आकाशे स्पष्टमन्यत् ॥ ६२ ॥ भा. टी. जिसप्रकार निर्जन स्थानमें अकस्मात् प्रत्यक्ष होकर वैताल ( भूत विशेष ) मालूम होयहै परन्तु वस्तुतः मिथ्या होयहै और जैसे निर्जन स्थानमें नीले पीले मेघोंसे बना हुवा गन्धर्वोंका नगर मालूम होने लगे है परन्तु वहभी वस्तुतः मिथ्या होयहै और जैसे आकाशमें किसी समय किसी कारण भ्रान्तिसे दो चंद्रमा मालूम होने लगे हैं इसी प्रकार सत्यस्वरूप आत्मामें जगत सत्यसा प्रतीत होयहै वस्तुतः सत्य नहीं है ॥ ६२ ॥ यथातरंगकल्लोलैर्जलमेवस्फुरत्यलम् ॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५३) पात्ररूपेण ताम्रं हि ब्रह्मांडौघैस्तथा- त्मता ॥ ६३ ॥ सं. टी. यथा तरंगेति सुगमम् ॥ ६३ ॥ भा. टी. जिसप्रकार जलही तरङ्गरूप देखनेमें आवैहै और ताम्रही पात्राकार देखनेमें आवैहै इसीप्रकार आत्माही ब्रह्माण्डाकार होकर दृष्टिगोचर होयहै ॥ ६३ ॥ घटनाम्नायथा पृथ्वी पटनाम्नाहि तं- तवः॥जगन्नाम्नाचिदाभाति ज्ञेयं तत्तद भावतः ॥ ६४ ॥ सं. टी. किंच घटेति तत्र पादत्रयं स्पष्टं ननु किम- नेन मिथ्यात्ववासनादाढर्येनेत्यत आह ज्ञेयमिति तद्- भावतो नामाभावतस्तद्ब्रह्म ज्ञेयम् “वाचारंभणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” इत्यादिश्रुतेः ॥ ६४ ॥ भा. टी. जैसे संसार मृत्तिका घटनाम करके प्रसिद्ध होय है और तन्तु पटनाम करकै प्रसिद्ध होयहै इसीप्रकार जीव नाम करकै संसारमें चिद्रूप आत्मा प्रसिद्ध होयहै सो मिथ्या है क्योंकि संसारके व्यवहारके वास्ते नाम संकेत मात्र होयहै ॥ ६४ ॥ सर्वोपि व्यवहारस्तु ब्रह्मणा क्रियते ज- नैः ॥ अज्ञानान्न विजानंति मृदेव हिघ टादिकम् ॥ ६५ ॥
( ५४ ) अपरोक्षानुभूतिः । सं. टी. ननु “ यत्र हि द्वैतमिव भवति ” इत्यादि श्रुत्यर्थदर्शनेनावस्थात्रये विदेहमोक्षावुक्तौ नतु जी- वन्मोक्ष इत्याशंक्याहः सर्वइति सर्वोऽपि लौकिको वैदिक- श्चेति शेषंस्पष्टम्, अयं भावः अज्ञानानिवृत्तिरेवं जीवन्मु- क्तिर्नतु द्वैतादर्शनमिति ॥ ६५ ॥ भा. टी. लोककी जीवन्मोक्षअवस्था दिखावें हैं क्यों कि (“यत्र हि द्वैतमिव भवति”) जिसमें ज्ञान होनेपर द्वैतकेसा व्यवहार किया जायहै वह जीवन्मोक्ष विदेह 'मोक्ष' से विल- क्षण तीसरी अवस्था कहलावैहै तिस जीवन्मोक्ष अवस्थामें सब लोक परब्रह्मके नियमानुसार सब प्रकार लौकिक और वैदिक कार्य्य करै है ऐसाहै संसारी पुरुष तबभी अज्ञानवशसे कोईभी ब्रह्मको जाननेको समर्थ नहीं होयहै जैसे यद्यपि घट मृत्ति- काही है तथापि मृत्तिका कहनेको समर्थ नहीं होयहै आशय यहहै कि लोक यह नहीं जाने है कि लोकव्यवहारकेही कारण द्वैत व्यवहार किया जायहै वस्तुतः अज्ञानकी निवृत्तिका नाम ज्ञान है और लोकव्यवहारमेंभी अद्वैत व्यवहार करनेका नाम ज्ञान नहीं है ॥ ६५ ॥ कार्यकारणतानित्यमास्ते घटमृदोर्य- था ॥ तथैवश्रुतियुक्तिभ्यां प्रपंचब्रह्म- णोरिह ॥ ६६ ॥ सं. टी. तत्रहेतुं सदृष्टांतमाह कार्येति, “यथा सौम्यै-
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५५ ) केन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्" इत्यादिश्रुतिः युक्तिस्तु कार्यकारणयोरन्यत्वे एककारणज्ञानात्सर्व- कार्यज्ञानं न स्यादित्यादि । सुगममन्यत् ॥ ६६ ॥ भा. टी. जैसे सदा घट और मृत्तिकाका कार्य्यकारण भाव देखनेमें आवैहै तिसी प्रकार श्रुतियोंसे और युक्तियोंसे प्रपञ्च अर्थात् जगत् और ब्रह्मका कार्य्य कारण भाव जाना जायहै ॥ ६६ ॥ गृह्यमाणेघटेयद्वन्मृत्तिकायातिवैबला- त् ॥ वीक्ष्यमाणेप्रपंचेपि ब्रह्मैवाभाति भासुरम् ॥ ६७ ॥ सं. टी. कार्यकारणयोरनन्यत्वमेव दृष्टांतेन स्पष्टयति गृह्यमाण इति भासुरं प्रमाणनिरपेक्षतयैव भासन- शीलं स्पष्टमन्यत् ॥ ६७ ॥ भा. टी. जैसे घटके विषयमें विचार करते करते अन्तमें मृत्तिकाही निश्चय होयहै इसीप्रकार इस संसारके विषयमें विचार करते करते बिना प्रमाणोंके प्रकाशवान् ब्रह्मही प्रतति होय है ॥ ६७ ॥ सदैवात्मा विशुद्धोऽस्ति ह्यशुद्धो भाति वै सदा ॥ यथैव द्विविधारज्जुर्ज्ञानिनो ऽज्ञानिनोऽनिशम् ॥ ६८ ॥ सं. टी. ननु ब्रह्मणि भासमाने प्रपंचो न भासेतेत्या
( ५६ ). अपरोक्षानुभूतिः । शंक्यावस्थाभेदेनोभयमपि भासत इति सदृष्टांतमाह सदैवेति तत्रज्ञानिनः सदैवात्मा विशुद्धः अज्ञानतत्का- र्यप्रपंचमलरहितत्वान्निष्प्रपंचोस्ति अज्ञानिनस्तु सदै- वाशुद्धोऽस्तीति भ्रमाद्विभाति वैहीति . तत्प्रसिद्धौ उभयत्रापि दृष्टांतः यथेति यथा रज्जुज्ञानिनः सर्पाभा वतया निर्विषत्वेनाभयंकरि अज्ञानिनस्तु सर्परूपतया विपरीतत्वेन भयंकरीति द्विविधा भाति अयंभावः ब्रह्म यद्यपि स्वयंप्रकाशत्वेन सदा भात्येव तथापि वृत्त्या- रूढत्वेन पुरुषार्थोपयोगीति ज्ञानिनः प्रतिभाति ना- ज्ञानिनः सूर्यदीपादिरिवचक्षुष्मदंधयोरितिदिक् ॥ ६८ ॥ भा. टी. जैसे एकहीरज्जु अज्ञानी पुरुषोंको भ्रमसे सर्प मालूम होयहै और ज्ञानवान् पुरुषोंको रज्जुही मालुम होजाय है इसीप्रकार एकही परमात्मा सर्वदा ज्ञानियोंको शुद्धस्वरूप और प्रकाशवान् मालूम होयहै .और अज्ञानियोंको शुद्धस्व रूप और प्रकाशवान् नहीं मालूम होयहै वस्तुतः परमात्मा शुद्धस्वरूप और प्रकाशवान्है ॥ ६८ ॥ यथैवमृन्मयः कुंभस्तद्वद्देहोपिचिन्म- यः ॥ आत्मानात्मविभागोयं मुधैव- क्रियतेऽबुधैः ॥ ६९ ॥ सं. टी. नन्वात्मा यदि सदैव निष्प्रपंचत्वेन भाति तर्हि किमर्थं देहात्मभेदो वर्णित इत्याशंक्याविवेकिनो
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५७) देहव्यतिरिक्तात्मबोधार्थं विवेकिनस्तु व्यर्थ एवेति सह- दृष्टांतमाह यथेति तत्राऽबुधैरित्यऽकारप्रश्लेषे मुधैवार्कियते अपि तु नेति काकुव्याख्यानम् अन्यत्सर्वं सुगमम्॥६९॥ भा. टी. यदि आत्मा सदा निष्प्रपञ्च भासमान होयहै तब आत्मा और देहका भेद क्यों कर दिखायाहै । ऐसी शंका होनेपर कहें हैं । जैसे कुम्भ मृत्तिकामय होयहै तिसीप्रकार देह चैतन्यस्वरूप आत्ममय होयहै इसीकारण ज्ञानी पुरुषको तौ आत्मा और देहका भेद मिथ्याहै ॥ ६९ ॥ सर्पत्वेनयथारज्जूरजतत्वेनशुक्तिका॥ विनिर्णीताविमूढेन देहत्वेनतथात्मता७०॥ सं. टी. इदानीमविवेकिनः कल्पितदेहेतादात्म्यं स- दृष्टांतमाह सर्पत्वेनेति ॥ ७० ॥ भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष रज्जुको सर्प मानलेयहै और सीपीको चांदी मानलेयहै इसीप्रकार आत्माको देह अ- ज्ञानीकी कल्पनारूप निर्णय करै है ॥ ७० ॥ घटत्वेनयथापृथ्वी पटत्वेनैवतंतवः ॥ विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्म- ता ॥ ७१ ॥ सं. टी. घटत्वेनेति ॥ ७१ ॥ भा. टी. जैसे अज्ञानी पुरुष मृत्तिकाको घट मानैहै और
श्लोकानामर्थः स्फुटतर एवास्त्यतो न व्याख्यानं
( ५८ ) अपरोक्षानुभूतिः । तन्तुओंको पट मानै है तिसी प्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७१ ॥ कनकं कुंडलत्वेन तरंगत्वेनवैजलम् ॥ विनिर्णीता० ॥ ७२ ॥ सं. टी. कनकमिति ॥ ७२ ॥ भा. टी. जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष सुवर्णकूं कुंडल मानै है और जलको तरङ्गरूप मानै है तिसी प्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७२ ॥ पुरुषत्वेयथास्थाणुर्जंलत्वेनमरीचिका ॥ विनिर्णीता० ॥ ७३ ॥ सं. टी. पुरुषत्व इति ॥ ७३ ॥ भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष शाखाहीन वृक्ष अर्थात् ठूंठवृक्षको पुरुषरूप मानैहै और मरुमरीचिकाको जलरूप मानै है तिसी प्रकार आत्माको देह रूप निर्णयकरै है ॥ ७३ ॥ गृहत्वेनैव काष्ठानिखड्ग त्वेनैवलोहता ॥ विनिर्णीता० ॥ ७४ ॥ सं. टी. गृहत्वेनेति सर्पत्वेनेत्यादि पंचानामप्येतेषां श्लोकानामर्थः स्फुटतर एवास्त्यतो न व्याख्यानं कृतम् ॥ ७४ ॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५९ ) भा. टी. जिसतरह बहुत सारे काष्ठोंके समूहको अज्ञानी घर मानलेयहै और लोहेको तलवार मानलेयहै तिसीप्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७४ ॥ .यथा वृक्षविपर्यासो जलाद्भवति कस्य- चित् ॥ तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्य- ज्ञानयोगतः ॥ ७५ ॥ सं. टी. नन्वन्यथा निर्णये किंकारणमितिचेत्तदज्ञा- नमेवेति सदृष्टांतमाह यथा वृक्षेत्यादि द्वादशभिः॥७५॥ भा. टी. जिस जलमें वृक्षकी छाया पडै है और अज्ञानी पुरुष उस प्रतिबिम्बकोही साक्षात् वृक्षमान लेय तिसीप्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७५ ॥ पोतेन गच्छतः पुंसः सर्वं भातीवचंच- लम् ॥ तद्वदा० ॥ ७६ ॥ सं. टी. पोतेनेति पोतेन नौकया स्पष्टमन्यत्॥७६॥ भा. टी.जिस प्रकार जिहाजनौकामें चढकर जानेवाले पुरुष- को सब चलताहुआ मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७६ ॥ पीतत्वं हियथा शुभ्रे दोषाद्भवति कस्य- चित् ॥ तद्व० ॥ ७७ ॥ सं. टी. पीतत्वमिति ॥ ७७ ॥
( ६० ) अपरोक्षानुभूतिः। भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषको पित्तदोषसे कमल वाय हो जाय है और श्वेत वस्तुभी पीली मालूम होने लगेहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥७७॥ चक्षुर्भ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्वं भातिभ्र- मात्मकम् ॥ तद्व० ॥ ७८ ॥ स. टी. चक्षुर्भ्यामिति ॥ ७८ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषके नेत्रोंमें भ्रम होय है अर्थात् घूमनेकी बीमारी होयहै उस पुरुषको सम्पूर्ण पदार्थ घूमते हुए मालूम होयहैं तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७८ ॥ अलातं भ्रमणेनैव वर्त्तुलं भाति सूर्य्य- वत् ॥ तद्वदा० ॥ ७९ ॥ सं. टी. अलातमिति ॥ ७९ ॥ भा.टी. जिसप्रकार जलाहुआ मुराड घुमानेसे वह सूर्य्यकी नाईं वर्त्तुलाकार मालूम होयहै तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७९ ॥ महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं ह्यति दूरतः॥ तद्वदा० ॥ ८० ॥ सं. टी. महत्त्व इति हीति सर्वलोकप्रसिद्धौ ॥८०॥ भा. टी. जिस प्रकार बहुत बडी वस्तुभी अत्यन्त दूरसे
संस्कृतटीका-भाषार्टीकासहिता । ( ६१ ) अतिसूक्ष्मकी तरह दीखै है तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८० ॥ सूक्ष्मत्त्वेसर्वभावानां स्थूलत्वं चोपने- त्रतः ॥ तद्वदा० ॥ ८१ ॥ सं. टी. सूक्ष्मत्वेइति ॥ ८१ ॥ भा. टी. जिस प्रकार अतिसूक्ष्म वस्तुओंकाभी उपनेत्र अर्थात् दूरवीन आदिसे अतिस्थूल वस्तुकी तरह बोध होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥८१॥ काचभूमौजलत्वंवा जलभूमौहिका चता ॥ तद्वदा० ॥ ८२ ॥ सं. टी. काचभूमाविति ॥ ८२ ॥ भा. टी. जिस प्रकार काँचकी भूमिमें जलकी बुद्धि होय है और जलकी भूमिमें काँचकी बुद्धि होयहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहज्ञान है ॥ ८२ ॥ यद्वदग्नौ मणित्वं हि मणौ वा वह्निता पुमान् ॥ तद्वदा० ॥ ८३ ॥ सं. टी. यद्वदिति ॥ ८३ ॥ भा. टी. जिस प्रकार भ्रमसे अग्निमें मणिकी बुद्धि होय है और मणिमें अग्निकी बुद्धि होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८३ ॥
( ६२ ) अपरोक्षानुभूतिः अभ्रेषु सत्सु धावत्सु सोमो धावति भाति वै ॥ तद्वदा० ॥ ८४ ॥ सं. टी. अभ्रेष्विति ॥ ८४ ॥ भा. टी. जिस प्रकार आकाशमें मेघोंके दौडनेसे चन्द्रमा दौडतासा मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मा में देहका ज्ञान है ॥ ८४ ॥ यथैवदिग्विपर्यासो मोहाद्भवति कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८५ ॥ सं. टी. यथेति : यथावृक्षेत्यादिश्लोकानां स्फुटार्थ त्वात्पिष्टपेषणतुल्यत्वेन न व्याख्यानं कृतम् ॥ ८५ ॥ भा. टी. जिस प्रकार मोह वशसे किसीको दिशाओंमें भ्रम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ८५ ॥ यथाशशी जले भाति चंचलत्वेन कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८६ ॥ सं. टी. यथाशशीति शशीत्युपलक्षणं सूर्यादीना- मपि शेषं स्पष्टम् ॥ ८६ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसीको किसी समय जलके हिलनेसे चन्द्रका प्रतिबिम्ब हिलनेसे चन्द्रमा हिलैहै ऐसा बोध होय इसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८६ ॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता ( ६३ ) एवमात्मन्यविद्यातो देहाध्यासो हि जायते ॥ एवमात्मपरिज्ञानाल्लीयते च परात्मनि ॥ ८७ ॥ सं. टी. एवं द्वादशभिः श्लोकैरुक्तमर्थमुपसंहरति एवमिति एवमुक्तेनप्रकारेणात्मन्यविद्यातः आत्माज्ञा- नात् देहाध्यासो मनुष्योऽहमित्यादिबुद्धिर्जायते भवति हीति प्रसिद्धौ नन्वेतस्य निवृत्तिः कुतोभवेदिति चेदा- त्मज्ञानादेवेत्याहोत्तरार्धेन सइति सएव देहाध्यास ऐवा- त्मपरिज्ञानात् ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारात्परात्मनि अज्ञा- नतत्कार्यरहिते प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मणि लीयते ब्रह्मस्वरूपे णावतिष्ठते नह्यधिष्ठानंविनाऽऽरोपितस्य स्वरूपमस्ति चकारादध्यासकारणमज्ञानमपि लीयतइति अन्यथाऽध्या सल्याभावादित्यर्थः नहि कारणे सतिकार्यस्य लयः संभवति तस्मादात्मज्ञानादेव सकारणकार्याध्यासनिवृ त्तिरित्यलं पल्लवितेन ॥ ८७ ॥ भा. टी. इस प्रकार आत्मामें देहाध्यास अर्थात् देह ज्ञान होय है और जब आत्माका तत्वपरिज्ञान होयहै तब वह देहाध्यास परमात्मामें लीन होजाय है अर्थात् देहका ज्ञान आत्मज्ञानमें लय होजायं है ॥ ८७ ॥ सर्वमात्मतयाज्ञातं जगत्स्थावरजंग
( ६४ ) अपरोक्षानुभूतिः । मम् ॥ अभावात्सर्वभावानांदेहस्य चा- त्मता कुतः ॥ ८८ ॥ सं. टी. एतदेव विवृणोति सर्वमिति आत्मता देह- स्य नेत्यर्थः स्पष्टमन्यत् ॥ ८८ ॥ भा. टी. जब स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप मालूम होने लगे है तब सब पदार्थोंके अनित्य होनेसे देह जो आत्मा किस प्रकार होसके है अर्थात् कभीभी नहीं होय है ॥ ८८ ॥ आत्मानंसततंजानन्कालंनयमहाद्यु- ते ॥ प्रारब्धमखिलंभुंजन्नोद्वेगंकर्तुम- र्हसि ॥ ८९ ॥ सं. टी. ननु ज्ञानिनो निष्प्रपंचात्मतया मम किं स्यात् ब्रह्मण्यभोजनेनान्यस्तृप्यतीतिचेदतआह आत्मानमि- ति भोमहाद्युते कामादिपराभवेन स्वहितसाधनोन्मु- खस्त्वं आत्मानं प्रत्यगभिन्नं सततं आसुप्तिमृतिपर्यन्तं जानन् वेदांतवाक्यैर्विचारयन् कालं नयातिक्रामस्व, विचारसाध्यज्ञानानंतरं चाखिलं प्रारब्धं चरमदेहारं- भकं कर्म भुंजन् सुखदुःखाभासानुभवेन क्षपयन्समुद्वेगं कर्तुनाहर्सीत्यर्थः ॥ ८९ ॥ भा.टी. हे महामते ! सदा आत्माको जानता हुआ सम- यको व्यतीत कर समस्त प्रारम्भ किये हुए कर्म्मके फलको भोगता हुआ उद्वेग मत कर ॥ ८९ ॥
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६६ ) उत्पन्नेप्यात्मविज्ञाने प्रारब्धंनैवमुंच- ति ॥ इतियच्छ्रूयतेशास्त्रे तन्निराक्रिय- तेऽधुना ॥ ९० ॥ सं. टी. वस्तुतस्तु प्रारब्धमेव नास्ति कुतोभोगः भोगाभावे कुत उद्वेगकारणं तदभावेच कुतस्तरां तन्नि- षेधोपदेश इतिवेदांतसिद्धांतरहस्यं वक्तुं प्रतिजानत आचार्याःउत्पन्नः इति अत्रेयं प्रक्रिया जगत्प्रतीतिस्त्रिधा लौकिकी शास्त्रीयानुभाविकी चेति तत्राद्या १पारमार्थिकी द्वितीयाऽपरमार्थिकी तृतीयातुप्रातिभासिकी तासां निवृ- त्तिस्तु क्रमात् वेदांतश्रवणादित्रयसाक्षात्कारप्रारब्धक्षयै- र्भवति नान्यथेति तत्रेयं प्रतिज्ञाऽन्यप्रतीत्यभिप्रायेणे- तिज्ञातव्यं श्लोकार्थस्तु स्फुट एव ॥ ९० ॥ भा. टी. आत्मज्ञान होने परभी पुरुष कर्म्मफलका त्याग नहीं करै है ऐसा शास्त्रोंमें सुननेमें आवे है उसका अब हम निराकरण अर्थात् खण्डन करैं हैं ॥ ९० ॥ तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्य ते ॥ देहादीनामसत्त्वात्तु यथास्वप्नोवि बोधतः ॥ ९१ ॥ सं. टी. तदेवाह तत्त्वेति ज्ञानेन सर्वव्यवहारकारणा- १ व्यावहारिकी ।
( ६६ ) अपरोक्षानुभूतिः । ज्ञाननिवृत्तौ प्रारब्धाभावइति श्लोकार्थः । पदार्थस्तु स्फुटएव ॥ ९१ ॥ • भा. टी. तत्त्वज्ञानके अनन्तर प्रारब्ध अर्थात् कर्म्मफल नहीं रहताहै क्योंकि जैसे स्वप्नमें नानाप्रकार विचित्र विचित्र प्रकार देखनेमें आवैं हैं और जब पुरुष जगैहै तौ सबझूटे होजायहैं इसी प्रकार आत्मज्ञान होनेसे देहादि असत् स्वरूप मालूम होने लगैं हैं और जब देहादिक असत् हुए हैं तब प्रारब्ध कर्म्म और उनके फलभी असत्स्वरूप होजायहैं॥९१॥ कर्मजन्मांतरीयं यत्प्रारब्धमितिकी- र्तितम् ॥ तत्तूजन्मांतराभावात्पुंसोने- वास्तिकर्हिचित् ॥ ९२ ॥ सं. टी. इदानीं प्रारब्धशब्दं व्युत्पादयन्नुक्तमुपसंह- रति कर्म्मोति तत्र कर्म त्रिविधं संचितक्रियमाणप्रारब्ध- भेदात् तन्मध्ये भाविदेहारंभकं संचितं तथावर्तमान देहनिर्वर्त्त्यंक्रियमाणं प्रारब्धंतु वर्तमानदेहारंभकं तत्र यद्यपि संचितं जन्मांतरीयमेव तथापि भाविदेहस्य त- त्प्रारब्धमेव भवति तेनेदं सिद्धमात्मनः स्वतः कर्तृत्वा- भावात्कालत्रयेपि जन्मनास्तीति सर्वमवदातम् ॥ ९२॥ भा.टी. पूर्व जन्मके कर्म्म प्रारब्ध कहैं हैं और जब पुरुषको तत्त्वज्ञान होय है फिर जन्म नहीं होयहै यदि जन्म नहीं हुआ तौ कर्मका भोक्ता कोन होय इस कारण तत्त्वज्ञान होनेके
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६७ ) अनन्तर पुरुष कर्म्मफलका भोक्ता नहीं होयहै । जन्म नहीं होनेमें यह श्रुति प्रमाणहै ( “नं स पुनरावर्त्तते” ) ॥ ९२ ॥ स्वप्नदेहोयथाध्यस्तस्तथैवायं हि देह- कः ॥ अध्यस्तस्य कुतोजन्म जन्मा- भावे हि तत्कुतः ॥ ९३ ॥ सं. टी. पूर्वोक्तं दृष्टांतं विवृण्वन्सकारणजन्माभावे युक्तिमाह स्वप्नेति जन्माभावे तत्प्रारब्धं कुतः स्पष्ट मन्यत् ॥ ९३ ॥ भा. टी. स्वप्नके देहकी तरह यह देह अध्यस्त ( विनष्ट ) है फिर जन्म किसप्रकार होसकै है इससे किसप्रकार प्रारब्ध अर्थात् पूर्व जन्मके कर्म्मफलको भोगसकै है । क्योंकि जब जन्महोय तौ कर्म्म भोगै जन्मही नहीं तौ कर्म्म कहां ॥ ९३ ॥ उपादानं प्रपंचस्य मृद्भांडस्येवकथ्य- ते ॥ अज्ञानं चैववेदांतैस्तस्मिन्नष्टेक्व विश्वता ॥ ९४ ॥ सं. टी. ननु देहादिप्रपंचस्य यतोवेत्यादिश्रुतेः सत्य ब्रह्मजन्यत्वात्कथंप्रातिभासिकत्वमितिचेदुच्यते उपा- दानमिति अत्र कारणं द्विविधं निमित्तोपादानभेदात् तत्र निमित्तं नामोत्पत्तिमात्रकारणं उपादानंतूत्प- त्तिस्थितिलयकारणं तत्र वेदांतैः ‘ मायां तु प्रकृतिं वि
( ६८ ) अपरोक्षानुभूतिः। द्यात् ' इत्यादिभिः प्रपंचस्योपादानमज्ञानं पठ्यते च- काराद्ब्रह्मापि अत्रायंभावःनकेवलं ब्रह्मैव जगत्कारणंनि र्विकारत्वात् नापि केवलमज्ञानं जडत्वात् तस्मादुभयं मिलित्वैव जगत्कारणंभवतीति "सत्यानृते मिथुनी- करोति " इत्यादिश्रुतेः तत्रदृष्टांतभांडस्य कटकरका- देर्मृदिव मृत्पिंडइव तत्र जलस्थाने ब्रह्म पिंडीकरण- सामर्थ्यसाम्यादज्ञानं तु मृत्तिकास्थाने आवरकत्वसा- म्यात् तत्र ब्रह्मणोऽविनाशित्वाद्ब्रह्मज्ञानेन तस्मिनज्ञा- न एव नष्टेसति विश्वता जीवजगदीश्वरात्मकजगद्भावः क्व नक्काप्यस्तीत्यर्थः ॥ ९४ ॥ भा. टी. जैसे घटके मृत्तिका और जल दो उपादान कारणहैं इसी प्रकार प्रपञ्चकेभी ब्रह्म और अज्ञान दो उपादान कारणहैं ऐसा वेदान्त शास्त्रोंके प्रमाणसे जाना जायहै और जब उपादान स्वरूप अज्ञानहीका नाश होगया तौ फिर संसार कहां और जब संसार नहीं तौ कर्म्मभोगभी नहीं ॥ ९४ ॥ यथारज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात् ॥ तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्प- श्यति मूढधीः ॥ ९५ ॥ सं. टी. मिथुनीभावस्यैव जगत्कारणत्वं सदृष्टांतं प्रपंचयति यथारज्जुमिति ॥ ९५ ॥ भा. टी. जैसे भ्रम वशसे रज्जुमें सर्पका ज्ञान होजाय और सर्पमें रज्जुज्ञान होनेसे मूढ पुरुष सर्पको पकडलेय हैं
संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६९ ), तिसी प्रकार सत्यस्वरूप ब्रह्मको नहीं जानके जगत्को सत्य- रूप मानै है और फँसरहै है ॥ ९५ ॥ रज्जुरूपेपरिज्ञाते सर्पखंडंनतिष्ठति ॥ अधिष्ठानेतथाज्ञाते प्रपंचः शून्यतां गतः ॥ ९६ ॥ सं० टी० इदानीं यदुक्तं तस्मिन्नष्टे क्वविश्वतेति तत प्रपंचयन् पूर्वोक्तं प्रारब्धाभावं सदृष्टांतमुपसंहरति सार्द्धेन रज्जुरूपइति स्पष्टम् ॥ ९६ ॥ भा० टी० जैसे रज्जुमें रज्जुका ज्ञान होनेसे सर्पज्ञाननहीं रहै है तिसी प्रकार प्रपञ्चके अधिष्ठान भूत परमात्माके ज्ञान होने पर प्रपञ्च मिथ्या मालूम होयहै ॥ ९६ ॥ देहस्यापि प्रपंचत्वात्प्रारब्धावस्थितिः कुतः ॥ अज्ञानिजनबोधार्थं प्रारब्धं वक्तिवै श्रुतिः ॥ ९७ ॥ सं० टी० किंच देहस्येति ननु जीवन्मुक्तस्य ज्ञानिनः प्रारब्धाभावेसति “ अत्र ब्रह्मसमश्नुते” इत्यादिश्रुतिः प्रारब्धं किमर्थं वक्तीति चेदुच्यते अर्द्धेन अज्ञानीति श्रुतिः अज्ञानिजनबोधार्थं प्रारब्धं वक्तीत्यर्थः ज्ञानेन सर्वव्यवहारकारणेऽज्ञाने नष्टेसति ज्ञानिनः कथंव्यवहार इत्यज्ञानिभिराशंकिते प्रारब्धादिति तद्वोधार्थमिति शेषं स्पष्टम् ॥ ९७ ॥