भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५९ ) भा. टी. जिसतरह बहुत सारे काष्ठोंके समूहको अज्ञानी घर मानलेयहै और लोहेको तलवार मानलेयहै तिसीप्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७४ ॥ .यथा वृक्षविपर्यासो जलाद्भवति कस्य- चित् ॥ तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्य- ज्ञानयोगतः ॥ ७५ ॥ सं. टी. नन्वन्यथा निर्णये किंकारणमितिचेत्तदज्ञा- नमेवेति सदृष्टांतमाह यथा वृक्षेत्यादि द्वादशभिः॥७५॥ भा. टी. जिस जलमें वृक्षकी छाया पडै है और अज्ञानी पुरुष उस प्रतिबिम्बकोही साक्षात् वृक्षमान लेय तिसीप्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७५ ॥ पोतेन गच्छतः पुंसः सर्वं भातीवचंच- लम् ॥ तद्वदा० ॥ ७६ ॥ सं. टी. पोतेनेति पोतेन नौकया स्पष्टमन्यत्॥७६॥ भा. टी.जिस प्रकार जिहाजनौकामें चढकर जानेवाले पुरुष- को सब चलताहुआ मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७६ ॥ पीतत्वं हियथा शुभ्रे दोषाद्भवति कस्य- चित् ॥ तद्व० ॥ ७७ ॥ सं. टी. पीतत्वमिति ॥ ७७ ॥