अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६० ) अपरोक्षानुभूतिः। भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषको पित्तदोषसे कमल वाय हो जाय है और श्वेत वस्तुभी पीली मालूम होने लगेहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥७७॥ चक्षुर्भ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्वं भातिभ्र- मात्मकम् ॥ तद्व० ॥ ७८ ॥ स. टी. चक्षुर्भ्यामिति ॥ ७८ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषके नेत्रोंमें भ्रम होय है अर्थात् घूमनेकी बीमारी होयहै उस पुरुषको सम्पूर्ण पदार्थ घूमते हुए मालूम होयहैं तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७८ ॥ अलातं भ्रमणेनैव वर्त्तुलं भाति सूर्य्य- वत् ॥ तद्वदा० ॥ ७९ ॥ सं. टी. अलातमिति ॥ ७९ ॥ भा.टी. जिसप्रकार जलाहुआ मुराड घुमानेसे वह सूर्य्यकी नाईं वर्त्तुलाकार मालूम होयहै तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७९ ॥ महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं ह्यति दूरतः॥ तद्वदा० ॥ ८० ॥ सं. टी. महत्त्व इति हीति सर्वलोकप्रसिद्धौ ॥८०॥ भा. टी. जिस प्रकार बहुत बडी वस्तुभी अत्यन्त दूरसे