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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

( ६० ) अपरोक्षानुभूतिः। भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषको पित्तदोषसे कमल वाय हो जाय है और श्वेत वस्तुभी पीली मालूम होने लगेहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥७७॥ चक्षुर्भ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्वं भातिभ्र- मात्मकम् ॥ तद्व० ॥ ७८ ॥ स. टी. चक्षुर्भ्यामिति ॥ ७८ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसी पुरुषके नेत्रोंमें भ्रम होय है अर्थात् घूमनेकी बीमारी होयहै उस पुरुषको सम्पूर्ण पदार्थ घूमते हुए मालूम होयहैं तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ७८ ॥ अलातं भ्रमणेनैव वर्त्तुलं भाति सूर्य्य- वत् ॥ तद्वदा० ॥ ७९ ॥ सं. टी. अलातमिति ॥ ७९ ॥ भा.टी. जिसप्रकार जलाहुआ मुराड घुमानेसे वह सूर्य्यकी नाईं वर्त्तुलाकार मालूम होयहै तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ७९ ॥ महत्त्वे सर्ववस्तूनामणुत्वं ह्यति दूरतः॥ तद्वदा० ॥ ८० ॥ सं. टी. महत्त्व इति हीति सर्वलोकप्रसिद्धौ ॥८०॥ भा. टी. जिस प्रकार बहुत बडी वस्तुभी अत्यन्त दूरसे

संस्कृतटीका-भाषार्टीकासहिता । ( ६१ ) अतिसूक्ष्मकी तरह दीखै है तिसी प्रकार अज्ञानवशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८० ॥ सूक्ष्मत्त्वेसर्वभावानां स्थूलत्वं चोपने- त्रतः ॥ तद्वदा० ॥ ८१ ॥ सं. टी. सूक्ष्मत्वेइति ॥ ८१ ॥ भा. टी. जिस प्रकार अतिसूक्ष्म वस्तुओंकाभी उपनेत्र अर्थात् दूरवीन आदिसे अतिस्थूल वस्तुकी तरह बोध होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे इस आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥८१॥ काचभूमौजलत्वंवा जलभूमौहिका चता ॥ तद्वदा० ॥ ८२ ॥ सं. टी. काचभूमाविति ॥ ८२ ॥ भा. टी. जिस प्रकार काँचकी भूमिमें जलकी बुद्धि होय है और जलकी भूमिमें काँचकी बुद्धि होयहै तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहज्ञान है ॥ ८२ ॥ यद्वदग्नौ मणित्वं हि मणौ वा वह्निता पुमान् ॥ तद्वदा० ॥ ८३ ॥ सं. टी. यद्वदिति ॥ ८३ ॥ भा. टी. जिस प्रकार भ्रमसे अग्निमें मणिकी बुद्धि होय है और मणिमें अग्निकी बुद्धि होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८३ ॥

( ६२ ) अपरोक्षानुभूतिः अभ्रेषु सत्सु धावत्सु सोमो धावति भाति वै ॥ तद्वदा० ॥ ८४ ॥ सं. टी. अभ्रेष्विति ॥ ८४ ॥ भा. टी. जिस प्रकार आकाशमें मेघोंके दौडनेसे चन्द्रमा दौडतासा मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मा में देहका ज्ञान है ॥ ८४ ॥ यथैवदिग्विपर्यासो मोहाद्भवति कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८५ ॥ सं. टी. यथेति : यथावृक्षेत्यादिश्लोकानां स्फुटार्थ त्वात्पिष्टपेषणतुल्यत्वेन न व्याख्यानं कृतम् ॥ ८५ ॥ भा. टी. जिस प्रकार मोह वशसे किसीको दिशाओंमें भ्रम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ८५ ॥ यथाशशी जले भाति चंचलत्वेन कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८६ ॥ सं. टी. यथाशशीति शशीत्युपलक्षणं सूर्यादीना- मपि शेषं स्पष्टम् ॥ ८६ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसीको किसी समय जलके हिलनेसे चन्द्रका प्रतिबिम्ब हिलनेसे चन्द्रमा हिलैहै ऐसा बोध होय इसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८६ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता ( ६३ ) एवमात्मन्यविद्यातो देहाध्यासो हि जायते ॥ एवमात्मपरिज्ञानाल्लीयते च परात्मनि ॥ ८७ ॥ सं. टी. एवं द्वादशभिः श्लोकैरुक्तमर्थमुपसंहरति एवमिति एवमुक्तेनप्रकारेणात्मन्यविद्यातः आत्माज्ञा- नात् देहाध्यासो मनुष्योऽहमित्यादिबुद्धिर्जायते भवति हीति प्रसिद्धौ नन्वेतस्य निवृत्तिः कुतोभवेदिति चेदा- त्मज्ञानादेवेत्याहोत्तरार्धेन सइति सएव देहाध्यास ऐवा- त्मपरिज्ञानात् ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारात्परात्मनि अज्ञा- नतत्कार्यरहिते प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मणि लीयते ब्रह्मस्वरूपे णावतिष्ठते नह्यधिष्ठानंविनाऽऽरोपितस्य स्वरूपमस्ति चकारादध्यासकारणमज्ञानमपि लीयतइति अन्यथाऽध्या सल्याभावादित्यर्थः नहि कारणे सतिकार्यस्य लयः संभवति तस्मादात्मज्ञानादेव सकारणकार्याध्यासनिवृ त्तिरित्यलं पल्लवितेन ॥ ८७ ॥ भा. टी. इस प्रकार आत्मामें देहाध्यास अर्थात् देह ज्ञान होय है और जब आत्माका तत्वपरिज्ञान होयहै तब वह देहाध्यास परमात्मामें लीन होजाय है अर्थात् देहका ज्ञान आत्मज्ञानमें लय होजायं है ॥ ८७ ॥ सर्वमात्मतयाज्ञातं जगत्स्थावरजंग

( ६४ ) अपरोक्षानुभूतिः । मम् ॥ अभावात्सर्वभावानांदेहस्य चा- त्मता कुतः ॥ ८८ ॥ सं. टी. एतदेव विवृणोति सर्वमिति आत्मता देह- स्य नेत्यर्थः स्पष्टमन्यत् ॥ ८८ ॥ भा. टी. जब स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप मालूम होने लगे है तब सब पदार्थोंके अनित्य होनेसे देह जो आत्मा किस प्रकार होसके है अर्थात् कभीभी नहीं होय है ॥ ८८ ॥ आत्मानंसततंजानन्कालंनयमहाद्यु- ते ॥ प्रारब्धमखिलंभुंजन्नोद्वेगंकर्तुम- र्हसि ॥ ८९ ॥ सं. टी. ननु ज्ञानिनो निष्प्रपंचात्मतया मम किं स्यात् ब्रह्मण्यभोजनेनान्यस्तृप्यतीतिचेदतआह आत्मानमि- ति भोमहाद्युते कामादिपराभवेन स्वहितसाधनोन्मु- खस्त्वं आत्मानं प्रत्यगभिन्नं सततं आसुप्तिमृतिपर्यन्तं जानन् वेदांतवाक्यैर्विचारयन् कालं नयातिक्रामस्व, विचारसाध्यज्ञानानंतरं चाखिलं प्रारब्धं चरमदेहारं- भकं कर्म भुंजन् सुखदुःखाभासानुभवेन क्षपयन्समुद्वेगं कर्तुनाहर्सीत्यर्थः ॥ ८९ ॥ भा.टी. हे महामते ! सदा आत्माको जानता हुआ सम- यको व्यतीत कर समस्त प्रारम्भ किये हुए कर्म्मके फलको भोगता हुआ उद्वेग मत कर ॥ ८९ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६६ ) उत्पन्नेप्यात्मविज्ञाने प्रारब्धंनैवमुंच- ति ॥ इतियच्छ्रूयतेशास्त्रे तन्निराक्रिय- तेऽधुना ॥ ९० ॥ सं. टी. वस्तुतस्तु प्रारब्धमेव नास्ति कुतोभोगः भोगाभावे कुत उद्वेगकारणं तदभावेच कुतस्तरां तन्नि- षेधोपदेश इतिवेदांतसिद्धांतरहस्यं वक्तुं प्रतिजानत आचार्याःउत्पन्नः इति अत्रेयं प्रक्रिया जगत्प्रतीतिस्त्रिधा लौकिकी शास्त्रीयानुभाविकी चेति तत्राद्या १पारमार्थिकी द्वितीयाऽपरमार्थिकी तृतीयातुप्रातिभासिकी तासां निवृ- त्तिस्तु क्रमात् वेदांतश्रवणादित्रयसाक्षात्कारप्रारब्धक्षयै- र्भवति नान्यथेति तत्रेयं प्रतिज्ञाऽन्यप्रतीत्यभिप्रायेणे- तिज्ञातव्यं श्लोकार्थस्तु स्फुट एव ॥ ९० ॥ भा. टी. आत्मज्ञान होने परभी पुरुष कर्म्मफलका त्याग नहीं करै है ऐसा शास्त्रोंमें सुननेमें आवे है उसका अब हम निराकरण अर्थात् खण्डन करैं हैं ॥ ९० ॥ तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्य ते ॥ देहादीनामसत्त्वात्तु यथास्वप्नोवि बोधतः ॥ ९१ ॥ सं. टी. तदेवाह तत्त्वेति ज्ञानेन सर्वव्यवहारकारणा- १ व्यावहारिकी ।

( ६६ ) अपरोक्षानुभूतिः । ज्ञाननिवृत्तौ प्रारब्धाभावइति श्लोकार्थः । पदार्थस्तु स्फुटएव ॥ ९१ ॥ • भा. टी. तत्त्वज्ञानके अनन्तर प्रारब्ध अर्थात् कर्म्मफल नहीं रहताहै क्योंकि जैसे स्वप्नमें नानाप्रकार विचित्र विचित्र प्रकार देखनेमें आवैं हैं और जब पुरुष जगैहै तौ सबझूटे होजायहैं इसी प्रकार आत्मज्ञान होनेसे देहादि असत् स्वरूप मालूम होने लगैं हैं और जब देहादिक असत् हुए हैं तब प्रारब्ध कर्म्म और उनके फलभी असत्स्वरूप होजायहैं॥९१॥ कर्मजन्मांतरीयं यत्प्रारब्धमितिकी- र्तितम् ॥ तत्तूजन्मांतराभावात्पुंसोने- वास्तिकर्हिचित् ॥ ९२ ॥ सं. टी. इदानीं प्रारब्धशब्दं व्युत्पादयन्नुक्तमुपसंह- रति कर्म्मोति तत्र कर्म त्रिविधं संचितक्रियमाणप्रारब्ध- भेदात् तन्मध्ये भाविदेहारंभकं संचितं तथावर्तमान देहनिर्वर्त्त्यंक्रियमाणं प्रारब्धंतु वर्तमानदेहारंभकं तत्र यद्यपि संचितं जन्मांतरीयमेव तथापि भाविदेहस्य त- त्प्रारब्धमेव भवति तेनेदं सिद्धमात्मनः स्वतः कर्तृत्वा- भावात्कालत्रयेपि जन्मनास्तीति सर्वमवदातम् ॥ ९२॥ भा.टी. पूर्व जन्मके कर्म्म प्रारब्ध कहैं हैं और जब पुरुषको तत्त्वज्ञान होय है फिर जन्म नहीं होयहै यदि जन्म नहीं हुआ तौ कर्मका भोक्ता कोन होय इस कारण तत्त्वज्ञान होनेके

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६७ ) अनन्तर पुरुष कर्म्मफलका भोक्ता नहीं होयहै । जन्म नहीं होनेमें यह श्रुति प्रमाणहै ( “नं स पुनरावर्त्तते” ) ॥ ९२ ॥ स्वप्नदेहोयथाध्यस्तस्तथैवायं हि देह- कः ॥ अध्यस्तस्य कुतोजन्म जन्मा- भावे हि तत्कुतः ॥ ९३ ॥ सं. टी. पूर्वोक्तं दृष्टांतं विवृण्वन्सकारणजन्माभावे युक्तिमाह स्वप्नेति जन्माभावे तत्प्रारब्धं कुतः स्पष्ट मन्यत् ॥ ९३ ॥ भा. टी. स्वप्नके देहकी तरह यह देह अध्यस्त ( विनष्ट ) है फिर जन्म किसप्रकार होसकै है इससे किसप्रकार प्रारब्ध अर्थात् पूर्व जन्मके कर्म्मफलको भोगसकै है । क्योंकि जब जन्महोय तौ कर्म्म भोगै जन्मही नहीं तौ कर्म्म कहां ॥ ९३ ॥ उपादानं प्रपंचस्य मृद्भांडस्येवकथ्य- ते ॥ अज्ञानं चैववेदांतैस्तस्मिन्नष्टेक्व विश्वता ॥ ९४ ॥ सं. टी. ननु देहादिप्रपंचस्य यतोवेत्यादिश्रुतेः सत्य ब्रह्मजन्यत्वात्कथंप्रातिभासिकत्वमितिचेदुच्यते उपा- दानमिति अत्र कारणं द्विविधं निमित्तोपादानभेदात् तत्र निमित्तं नामोत्पत्तिमात्रकारणं उपादानंतूत्प- त्तिस्थितिलयकारणं तत्र वेदांतैः ‘ मायां तु प्रकृतिं वि

( ६८ ) अपरोक्षानुभूतिः। द्यात् ' इत्यादिभिः प्रपंचस्योपादानमज्ञानं पठ्यते च- काराद्ब्रह्मापि अत्रायंभावःनकेवलं ब्रह्मैव जगत्कारणंनि र्विकारत्वात् नापि केवलमज्ञानं जडत्वात् तस्मादुभयं मिलित्वैव जगत्कारणंभवतीति "सत्यानृते मिथुनी- करोति " इत्यादिश्रुतेः तत्रदृष्टांतभांडस्य कटकरका- देर्मृदिव मृत्पिंडइव तत्र जलस्थाने ब्रह्म पिंडीकरण- सामर्थ्यसाम्यादज्ञानं तु मृत्तिकास्थाने आवरकत्वसा- म्यात् तत्र ब्रह्मणोऽविनाशित्वाद्ब्रह्मज्ञानेन तस्मिनज्ञा- न एव नष्टेसति विश्वता जीवजगदीश्वरात्मकजगद्भावः क्व नक्काप्यस्तीत्यर्थः ॥ ९४ ॥ भा. टी. जैसे घटके मृत्तिका और जल दो उपादान कारणहैं इसी प्रकार प्रपञ्चकेभी ब्रह्म और अज्ञान दो उपादान कारणहैं ऐसा वेदान्त शास्त्रोंके प्रमाणसे जाना जायहै और जब उपादान स्वरूप अज्ञानहीका नाश होगया तौ फिर संसार कहां और जब संसार नहीं तौ कर्म्मभोगभी नहीं ॥ ९४ ॥ यथारज्जुं परित्यज्य सर्पं गृह्णाति वै भ्रमात् ॥ तद्वत्सत्यमविज्ञाय जगत्प- श्यति मूढधीः ॥ ९५ ॥ सं. टी. मिथुनीभावस्यैव जगत्कारणत्वं सदृष्टांतं प्रपंचयति यथारज्जुमिति ॥ ९५ ॥ भा. टी. जैसे भ्रम वशसे रज्जुमें सर्पका ज्ञान होजाय और सर्पमें रज्जुज्ञान होनेसे मूढ पुरुष सर्पको पकडलेय हैं

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६९ ), तिसी प्रकार सत्यस्वरूप ब्रह्मको नहीं जानके जगत्को सत्य- रूप मानै है और फँसरहै है ॥ ९५ ॥ रज्जुरूपेपरिज्ञाते सर्पखंडंनतिष्ठति ॥ अधिष्ठानेतथाज्ञाते प्रपंचः शून्यतां गतः ॥ ९६ ॥ सं० टी० इदानीं यदुक्तं तस्मिन्नष्टे क्वविश्वतेति तत प्रपंचयन् पूर्वोक्तं प्रारब्धाभावं सदृष्टांतमुपसंहरति सार्द्धेन रज्जुरूपइति स्पष्टम् ॥ ९६ ॥ भा० टी० जैसे रज्जुमें रज्जुका ज्ञान होनेसे सर्पज्ञाननहीं रहै है तिसी प्रकार प्रपञ्चके अधिष्ठान भूत परमात्माके ज्ञान होने पर प्रपञ्च मिथ्या मालूम होयहै ॥ ९६ ॥ देहस्यापि प्रपंचत्वात्प्रारब्धावस्थितिः कुतः ॥ अज्ञानिजनबोधार्थं प्रारब्धं वक्तिवै श्रुतिः ॥ ९७ ॥ सं० टी० किंच देहस्येति ननु जीवन्मुक्तस्य ज्ञानिनः प्रारब्धाभावेसति “ अत्र ब्रह्मसमश्नुते” इत्यादिश्रुतिः प्रारब्धं किमर्थं वक्तीति चेदुच्यते अर्द्धेन अज्ञानीति श्रुतिः अज्ञानिजनबोधार्थं प्रारब्धं वक्तीत्यर्थः ज्ञानेन सर्वव्यवहारकारणेऽज्ञाने नष्टेसति ज्ञानिनः कथंव्यवहार इत्यज्ञानिभिराशंकिते प्रारब्धादिति तद्वोधार्थमिति शेषं स्पष्टम् ॥ ९७ ॥

( ७० ) . अपरोक्षानुभूतिः । भा.टी. देहभी प्रपञ्चस्वरूपहै और प्रपञ्चके अध्यस्त होनेसे पूर्व जन्मके कर्म्म कहां यदि कहो साक्षात् श्रुति कर्म्मभोगको कहै है तहां ऐसा जानना कि जिनको तत्त्वज्ञान नहीं हुआहै अज्ञानी हैं उनके बोध न करानेके वास्ते श्रुति कहेहै॥९७॥ क्षीयंतेचास्यकर्म्माणि तस्मिन्दृष्टेपरा- वरे॥ बहुत्वंतन्निषेधार्थं श्रुत्यागीतंचय- त्स्फुटम् ॥ ९८ ॥ सं. टी. किंतर्हि ज्ञानिबोधार्थं वक्ति श्रुतिरितिचेदु- च्यते क्षीयंतइति “भिद्यते हृदयग्रंथिश्चिद्यंते सर्वसंश- याः॥ क्षीयंते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे” इतिश्रु- त्या कर्माणीति बहुत्वं यत् स्फुटं गीतं तत्तन्निषेधार्थं प्रारब्धाभावप्रतिपादनार्थं अन्यथा संचितक्रियमाणा- पेक्षया कर्मणीति द्वित्वं गेयं तथा न गीतमतो ब्रह्मा- त्मसाक्षात्कारात् चिज्जडग्रंथिभेदेन संचितक्रियमाण- प्रारब्धाख्यत्रिविधकर्मक्षयांते परमपुरुषार्थं ज्ञानिबोधार्थं श्रुतिर्वक्तीतिभावः ॥ ९८ ॥ भा. टी. जो कर्म्म श्रुतिनें प्रतिपादन कियाहै वह सम्पूर्ण परात्पर परमात्माके दर्शन करनेसे अर्थात् तत्त्वज्ञान होनेसे नष्ट होजाता है सञ्चित, क्रियमाण, प्रारब्ध, तीन प्रकारका कर्म्म श्रुतियोंमें कहागयाहै सो कर्म्मका अभाव प्रतिपादन करनेके अर्थ बहुत्व दरसाया ॥ ९८ ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (७१) उच्यतेऽज्ञैर्बलाच्चैत्तदानर्थद्वयागमः॥ वेदांतमतहानं च यतोज्ञानमिति श्रु- तिः ॥ ९९॥ सं० टी० उक्तवैपरीत्येबाधकमाह उच्यतइति एत त्प्रारब्धमज्ञैः श्रुतितात्पर्यान्भिज्ञैर्बलादविवेकसामर्थ्या- च्चेदुच्यते यथार्थतय प्रतिपाद्यते चकारादद्वयात्मा- नं नपश्यंति तदाऽनर्थद्वयागमो दोषद्वयप्राप्तिः तत्र प्रारब्धरूपस्य द्वैतस्यांगीकारे अनिर्मोक्षप्रसंग एको दोषः मोक्षाभावे ज्ञानसंप्रदायोच्छेदरूपोद्वितीयो दोषइ तिनकेवलं दोषद्वयस्यैव प्राप्तिरपितु वेदांतमतहानंच वेदांतमतस्याद्वैतस्य हानं त्यागो भविष्यति प्रारब्ध ग्रहणरूपस्य द्वैतस्य याथार्थ्यादित्यर्थः तर्हि किंप्रति- पत्तव्यमित्यत आह यतइति यतो यस्याः सकाशात् ज्ञानंभवति तादृशी सा श्रुतिर्ग्राह्येति शेषः सा श्रुतिस्तु “ तमेवधीरोविज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ॥ नानुध्याया द्बहूञ्छब्दान् वाचोविग्लापनंहितत्” इति एतदभिप्रायः क इति चोल्लिख्यते धीरो विवेकी ब्राह्मणो ब्रह्मभावितु मिच्छुस्तमेव वेदांतप्रसिद्धमात्मानं विज्ञायाऽऽदावुपदे- शतः शास्त्रतश्च ज्ञात्वाऽनंतरंप्रज्ञां शास्त्राचार्योपदिष्टवि- षयामपरोक्षानुभवपर्यंतां जिज्ञासापरिसमाप्तिकरीं कुर्वीत बहून् कर्मोपासनाप्रतिपादकान् शब्दान् वाक्यसंदर्भा-

(७२) अपरोक्षानुभूतिः। न्नानुध्यायान्नांचिंतयेत् तर्हि तान् ब्रूयात्किनेत्याहवाचइति तद्वैतच्छास्त्रपठनं वाचोविग्लापनं विशेषणश्रमकरं हीति सर्वानुभवसिद्धमित्यलं पल्लवितेन ॥ ९९ ॥ भा. टी. यदि अनभिज्ञ अर्थात् अज्ञानी पुरुष बलात्कार करके कर्म अर्थात् प्रारब्धको स्वीकार करें तब उनको दो दोष आवेंगे एक तौ मोक्षका अभाव दूसरे मोक्ष न होनेसे ज्ञानका अभाव और इस प्रकार वेदान्त मत (अद्वैतवाद) की भी हानिहै इस हेतु प्रारब्धरूप द्वैत स्वीकार करना पड़ेगा अद्वैतवाद तौ होही नहीं सकेगा अब जिस श्रुतिसे ज्ञानलाभ होय ऐसी श्रुति कहनी होगी यदि श्रुति नहीं कहोगे तौ और कोई ज्ञानलाभका उपाय नहीं है ॥ ९९ ॥ त्रिपंचांगान्यथोवक्ष्ये पूर्वोक्तस्यहि ल- ब्धये ॥ तैश्चसर्वैः सदाकार्यं निदि- ध्यासनमेवतु ॥ १०० ॥ सं. टी. तदेवमेतावता ग्रंथसंदर्भण मुख्याधिकारिणो वैराग्यादिसाधनचतुष्टयपूर्वकं वेदांतवाक्यविचारएवप्र- त्यगभिन्नब्रह्मापरोक्षज्ञानद्वारा मुख्यं मोक्षकारणमित्य- भिहितं इदानीमसकृद्विचार्थापि बुद्धिमांद्यविषयास- क्त्यादिप्रतिबंधेनापरोक्षज्ञानं यस्य न्जायते तस्य मंदा- धिकारिणो निर्गुणब्रह्मोपासनमेव मुख्यं साधनमित्यभि-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ७३ ) प्रेत्यससाधनं ध्यानयोगं प्रतिजानत आचार्याः त्रिपं- चेति अथोशब्दोधिकारिभेदार्थः क्वचिदत इति पाठस्त- स्मिन् पक्षे यतो मंदाधिकारी विचारं न लभतेऽतो हे- तोरित्यर्थः त्रिपंच त्रिगुणितानि पंच पंचदशेत्यर्थः तत्संख्याकान्यंगानि निदिध्यासनांगिसाधकसाधनवि- शेषान् यज्ञसाधकप्रयाजादिवदित्यर्थः वक्ष्ये वक्ष्यामि तैर्वक्ष्यमाणैः सर्वैरंगैर्निदिध्यासनमेवकार्यं नतु तूष्णी- मवस्थानमुचितमित्यर्थः निदिध्यासनकर्तव्यप्रतिज्ञाप्र- योजनमाह पूर्वोक्तस्येति पूर्वोक्तस्य स्वरूपावस्थान लक्षणमोक्षस्य सिद्धय इति हीति वेदांतप्रसिद्धौ तुशब्दः पातंजलवैलक्षण्यलक्षणेन मोक्षस्य सिद्धय इति अनेना- ष्टांगप्रतिपादकं पातंजलमवैदिकत्वाद्वैशेषिकादिवदना- देयमिति ध्वनितम् ॥ १०० ॥ भा. टी. इसके अनन्तर पूर्व कहे हुए ज्ञानलाभके अर्थ १५ पन्द्रह निदिध्यासनके अङ्ग कहूँगा उन्हीं अङ्गोंके द्वारा सदा निदिध्यासन करना चाहिये ॥ १०० ॥ नित्याभ्यासादृते प्राप्तिर्न भवेत्सच्चिदा- त्मनः॥तस्माद्ब्रह्मनिदिध्यासेज्जिज्ञा- सुः श्रेयसेचिरम् ॥ १०१ ॥ सं. टी. मंदाधिकार्यन्यत्सर्वं कर्म सगुणोपासनविचा- ४

( ७४ ) अपरोक्षानुभूतिः । रहरूपं साधनं च विधाय श्रद्धयाचार्योक्तप्रकारेण निर्गुणं ब्रह्मैव निदिध्यासेदित्याह नित्येति स्पष्टम् ॥ १०१ ॥ भा. टी. निदिध्यासनके विना सच्चिदानन्द ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होयहै इसकारण ब्रह्मज्ञानके जाननेकी इच्छा करनेवाला बहुतकालतक मङ्गलके अर्थ निदिध्यासन करै ॥ १०१ ॥ यमोहिनियमस्त्यागो मौनंदेशश्चका- लता ॥ आसनं मूलबंधश्च देहसाम्यं च दृक्स्थितिः ॥ १०२ ॥ प्राणसंयमनं चैव प्रत्याहारश्च धारणा ॥ आत्म- ध्यानं समाधिश्च प्रोक्तान्यंगानि वै क्रमात् ॥ १०३ ॥ सं.टी. ननु कानि तान्यंगानि यैः सह निदिध्यासनं कर्त्तव्यमित्यपेक्षायां तानि निर्दिशति यमइति द्वाभ्याम् उत्तानाथावुभावपि श्लोकौ ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ भा. टी. यम, नियम, त्याग, मौन, देश, काल, आसन, मूलबन्ध, देहसाम्य, दृक्स्थिति, प्राणसंयमन, प्रत्याहार, धारण, आत्मध्यान, समाधि, यह सम्पूर्ण अङ्ग क्रमसे कहे हैं ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ सर्वं ब्रह्मेति विज्ञानादिंद्रियग्रामसंय- मः ॥ यमोयमिति संप्रोक्तोऽभ्यसनी- योमुहुर्मुहुः ॥ १०४ ॥ -

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । . ( ७५ ) सं. टी. इदानीमेतेषां प्रत्येकं निर्देशक्रमेण स्वाभि- मतानि लक्षणान्याह सर्वमित्याद्येकविंशत्या तत्र प्र- थमोद्दिष्टं यमं तावद्दर्शयति सर्वमिति सर्वमाकाशादि- देहांतं जगद्ब्रह्म बाधसामानाधिकरण्यद्वारा स्थाणुपुरुषा- दिवदित्यर्थः इति विज्ञानान्निश्चयाद्धेतोरिंद्रियाणां श्रो- त्रादीनामेकादशकरणानां ग्रामः समूहस्तस्य संयमः सम्यक् शब्दादिविषयाणां विनाशित्वसातिशयत्वदुः- खदत्वादिदोषदर्शनात् यमो विषयेभ्यो निवारणम् अयं यम इतिसंप्रोक्तः नतु केवलमहिंसादिरित्यर्थः ततश्च किमतआह अभ्यसनीय इति अयं मुहुर्मुहुरभ्यसनीय इति ॥ १०४ ॥ भा. टी. सम्पूर्ण जगत ब्रह्म है इस प्रकार निश्चय करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंका निग्रह करना है सो 'यम' कहावै है इसका अभ्यास पुरुषको बारम्बार करनायोग्य है ॥ १०४ ॥ सजातीयप्रवाहश्च विजातीयतिरस्कृ- तिः ॥ नियमोहिपरानन्दो नियमात्क्रि- यतेबुधैः ॥ १०५ ॥ सं. टी. एवं यमंलक्षयित्वा नियमंलक्षयति सजाती- येति सजातीयं प्रत्यगभिन्नं परंब्रह्म तदेकाकारोवृत्तिप्र- वाहः सजातीयप्रवाहः यद्वा सजातीयानामसंगोहमवि- क्रियोहमित्यादिप्रत्यगभिन्नब्रह्मप्रत्ययानांप्रवाहः चपुनः

(७६) अपरोक्षानुभूतिः। विजातीयतिरस्कृतिर्विजातीयं ब्रह्मात्मविलक्षणं जग- त्पूर्वसंस्काराज्जायमाना तदाकारावृत्तिरित्यर्थः । तस्य तिरस्कृतिर्दोषस्मृत्याऽधिकोपेक्षाऽनादरइत्यर्थः अयंनिय- मइत्यर्थः। नतु केवलं शौचादिरित्यर्थः। हीत्युपनिषत्प्र- सिद्धौ। नन्वनयोरुपनिषत्प्रसिद्धया कः पुरुषार्थ इतिचे दतआह परानंदइति ततश्च किमत आह नियमादित्या- दिसुगमम् ॥ १०५ ॥ भा. टी. सजातीय प्रवाह अर्थात् मैं ब्रह्महूं इस प्रकार ज्ञानका प्रवाह और विजातीयतिरस्कृति अर्थात् ब्रह्मसे अति- रिक्त सम्पूर्ण संसार मिथ्या है इस प्रकार ज्ञानको नियम कहे हैं ॥ १०५ ॥ त्यागः प्रपंचरूपस्य चिदात्मत्वावलो- कनात् ॥ त्यागोहि महतां पूज्यःसद्यो मोक्षमयो यतः ॥ १०६ ॥ सं. टी. इदानीं तृतीयं त्यागं लक्षयति त्यागइति प्रपंचरूपस्य प्रपंचो नामरूपलक्षणो रूप्यते घटोयं पटोयमित्यदि नामरूपतो निरूप्यते व्यवह्रियते प्रकाश्यते येन तत्प्रपंचरूपं सर्वाधिष्ठानभूतं पदार्थ- स्फुरणं तस्य चिदात्मत्वावलोकनाच्चिदजडं स्वतएव प्रकाशमानं ब्रह्म तदात्मास्वरूपं यस्य तद्भावस्तस्या- वलोकनमनुसंधानं तस्माद्धेतोर्यस्त्यागः नामरूपोपे-

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ७७ ) क्षा स एव त्यागस्त्यागशब्दवाच्यः "ईशावास्यमिदंस- र्व्वम्"इत्यादिश्रुतेः हीति विद्वदनुभवप्रसिद्धौ नन्वयं त्या- गो नकुत्रापि प्रसिद्ध इत्याशंक्याह महतांपूज्यइति तत्रहेतुः सद्यइति यतोयं त्यागः सद्योनुसंधानकालएव मोक्षमयः परमानंदस्वरूपावस्थानरूपः अतएवात्मत्- त्वविदामिष्टत्वादतिप्रसिद्धोयं त्यागइत्यर्थः । तस्मा- दयमेव मुमुक्षुणा कर्त्तव्यो नान्यः केवलस्वकर्मार्थ्यक- रणरूप इतिभावः एवमग्रेप्यूह्यम् ॥ १०६ ॥ भा. टी. चैतन्यस्वरूप तत्त्वको अवलोकन करके जो प्रपंचका अर्थात् घट पटादि नामसे व्यवहृत पदार्थोंका त्याग करना है सो त्याग कहावे है इसका महात्मा लोग बडा आदर करैं हैं इस कारण यह शीघ्रही मोक्षको देय है ॥ १०६ ॥ यस्माद्वाचोनिवर्तंते अप्राप्य मनसा सह ॥ यन्मौनंयोगिभिर्गम्यं तद्भवे- त्सर्वदा बुधः ॥ १०७ ॥ सं. टी. अथ मौनं लक्षयति यस्मादिति शब्दप्रवृत्ति- निमित्तजातिक्रियादेरभावात् मनोवाचामगोचरं यन्मौनं वक्तमशक्यं यद्ब्रह्म तथापि योगिभिर्गम्यं ज्ञानयोगिभिः प्रत्यगभिन्नत्वेन प्राप्यं तत्प्रसिद्धमेव ब्रह्मरूपंमौनं सर्वदा बुधो विवेकी भवेत्तदहमस्मीत्यनुसंदध्यादित्यर्थः १०७॥

( ७८ ) अपरोक्षानुभूतिः। भा. टी. जिसको वाणी और मन नहीं प्राप्त होसके हैं और योगी लोगोंको लब्धहोय है ऐसे परब्रह्मकाही नाम मौन है पण्डित जन तिस ब्रह्मका मैं ब्रह्महूं इस प्रकार अनुस- न्धान करे ॥ १०७ ॥ वाचो यस्मान्निवर्त्तंते तद्वक्तुंकेनशक्य- ते ॥ प्रपंचो यदि वक्तव्यः सोपिश- ब्दविवर्जितः ॥ १०८ ॥ इतिवातद्भवे- न्मौनं सतांसहजसंज्ञितम् ॥ गिरामौ- नंतुबालानां प्रयुक्तंब्रह्मवादिभिः ॥१०९॥ सं. टी. नन्विदं प्रत्यगभिन्नब्रह्मानुसंधानं ध्यानरूपं चतुर्दशमंगं प्रतीयते इत्याशंक्य स्वारस्यात्प्रकारांतरे- ण मौनमेव लक्षयति सार्द्धेन वाचइति अयम्भावः शब्दप्र- वृत्तिनिमित्ताभावाद्ब्रह्म यथावागविषयं तथानामरूप- जात्यादिप्रपंचोपि सदसदादिविकल्पासद्दत्वाद्वागतीतः ॥ १०८ ॥ इतीति इत्युक्तप्रकारेण ब्रह्मजगतोर्विवा- दत्यागरूपंवा तन्मौनं भवेत् केषामित्याकांक्षायां सतां चेदं प्रसिद्धमित्याह सतामिति सत्पुरुषाणां सहजस्थि- तिनाम्ना प्रसिद्धमित्यर्थः । ननु वाङ्नियमनमेव प्रसिद्धं मौनमितिचेदतआहार्द्धेन गिरेति ॥ १०९ ॥ भा. टी. जिसको वाणी नहीं प्राप्त होय उसकी वर्णना कौन करसके है अर्थात् कोई नहीं यदिः प्रपञ्चकी वर्णना

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (७९) करी जाय तौ वहभी शब्दरहित है अर्थात् प्रपञ्चमेंभी सत् असत् नाना प्रकारके पदार्थ मालूम होय हैं इसकारण प्रपंच- काभी वर्णन नहीं होसके है । इसकोभी मौन कहे है यह मौन साधुपुरुषोंको स्वभावसिद्ध होय है ब्रह्मवादी लोग बालकके मौनको मौन कहें हैं ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ आदावंतेच मध्ये च जनोयस्मिन्न वि- द्यते ॥ येनेदं सततं व्याप्तं सदेशोविज- नःस्मृतः ॥ ११० ॥ सं. टी. इदानीं देशंलक्षयति आदाविति अत्र जन- स्य त्रैकालिकाभाव आनुभविकः स्वप्रतीत्याज्ञेयः नतु- लौकिकशास्त्रीयप्रतीतिभ्यां विरोधादिति भावः स्पष्ट- मन्यत् ॥ ११० ॥ भा. टी. जहाँ आदि, अन्त, मध्यये कहींभी जन न होय जिस करके निरन्तर संसार व्याप्त रहै उस देशका नाम निर्जन देश है सदा जनशून्य स्थानही योगसाधनके अर्थ उपयुक्त होय है ॥ ११० ॥ कलनात्सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां निमे- षतः ॥ कालशब्देन निर्दिष्टो ह्यखंडा- नंदअद्वयः ॥ १११ ॥ सं. टी. अथ कालं लक्षयति कलनादिति निमेष-