भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (७९) करी जाय तौ वहभी शब्दरहित है अर्थात् प्रपञ्चमेंभी सत् असत् नाना प्रकारके पदार्थ मालूम होय हैं इसकारण प्रपंच- काभी वर्णन नहीं होसके है । इसकोभी मौन कहे है यह मौन साधुपुरुषोंको स्वभावसिद्ध होय है ब्रह्मवादी लोग बालकके मौनको मौन कहें हैं ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ आदावंतेच मध्ये च जनोयस्मिन्न वि- द्यते ॥ येनेदं सततं व्याप्तं सदेशोविज- नःस्मृतः ॥ ११० ॥ सं. टी. इदानीं देशंलक्षयति आदाविति अत्र जन- स्य त्रैकालिकाभाव आनुभविकः स्वप्रतीत्याज्ञेयः नतु- लौकिकशास्त्रीयप्रतीतिभ्यां विरोधादिति भावः स्पष्ट- मन्यत् ॥ ११० ॥ भा. टी. जहाँ आदि, अन्त, मध्यये कहींभी जन न होय जिस करके निरन्तर संसार व्याप्त रहै उस देशका नाम निर्जन देश है सदा जनशून्य स्थानही योगसाधनके अर्थ उपयुक्त होय है ॥ ११० ॥ कलनात्सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां निमे- षतः ॥ कालशब्देन निर्दिष्टो ह्यखंडा- नंदअद्वयः ॥ १११ ॥ सं. टी. अथ कालं लक्षयति कलनादिति निमेष-