अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८० ) अपरोक्षानुभूतिः । तआरभ्य कलनात्सर्गस्थितिप्रलयाधारत्वादित्यर्थः शेषं स्पष्टम् ॥ १११ ॥ भा. टी. जिसके निमेषमात्रमें ब्रह्मादि सर्वभूतोंका कलन (सृष्टि, स्थिति, प्रलय, ) होयहै इस कारण अखण्ड आनन्द- स्वरूप अद्वय ब्रह्मही काल शब्द करके कहाजायहै ॥ १११ ॥ सुखेनैवभवेद्यस्मिन्नजस्रंब्रह्मचिंतनम् ॥ आसनं तद्विजानीयान्नेतरत्सुखनाश- नम् ॥ ११२ ॥ सं. टी. आसनं लक्षयति सुखेनैवेति यस्मिन्सुखे सुखरूपे ब्रह्मणि चिंतनं कर्त्तव्याकर्त्तव्यचिंता नैवभवेत् तद्ब्रह्मासनं विजानीयादित्यन्वयः कीदृशं ब्रह्म अजस्रं कालत्रयावस्थायीत्यर्थः सुगममन्यत् ॥ ११२ ॥ भा. टी. जिसमें सदा भलीप्रकार सुखसे ब्रह्म विचार होय उसको आसन कहैं हैं उससे अतिरिक्तमें ब्रह्म विचार नहीं होय है इस कारण आसनसे अन्य सुखकारक नहीं होय है किन्तु सुख नाश होयहै । सो आसन पद्म स्वस्तिकादिक जानना ॥ ११२ ॥ सिद्धं यत्सर्वभूतादि विश्वाधिष्ठानम- व्ययम् ॥ यस्मिन् सिद्धाः समाविष्टा- स्तद्वै सिद्धासनंविदुः ॥ ११३ ॥