अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(७२) अपरोक्षानुभूतिः। न्नानुध्यायान्नांचिंतयेत् तर्हि तान् ब्रूयात्किनेत्याहवाचइति तद्वैतच्छास्त्रपठनं वाचोविग्लापनं विशेषणश्रमकरं हीति सर्वानुभवसिद्धमित्यलं पल्लवितेन ॥ ९९ ॥ भा. टी. यदि अनभिज्ञ अर्थात् अज्ञानी पुरुष बलात्कार करके कर्म अर्थात् प्रारब्धको स्वीकार करें तब उनको दो दोष आवेंगे एक तौ मोक्षका अभाव दूसरे मोक्ष न होनेसे ज्ञानका अभाव और इस प्रकार वेदान्त मत (अद्वैतवाद) की भी हानिहै इस हेतु प्रारब्धरूप द्वैत स्वीकार करना पड़ेगा अद्वैतवाद तौ होही नहीं सकेगा अब जिस श्रुतिसे ज्ञानलाभ होय ऐसी श्रुति कहनी होगी यदि श्रुति नहीं कहोगे तौ और कोई ज्ञानलाभका उपाय नहीं है ॥ ९९ ॥ त्रिपंचांगान्यथोवक्ष्ये पूर्वोक्तस्यहि ल- ब्धये ॥ तैश्चसर्वैः सदाकार्यं निदि- ध्यासनमेवतु ॥ १०० ॥ सं. टी. तदेवमेतावता ग्रंथसंदर्भण मुख्याधिकारिणो वैराग्यादिसाधनचतुष्टयपूर्वकं वेदांतवाक्यविचारएवप्र- त्यगभिन्नब्रह्मापरोक्षज्ञानद्वारा मुख्यं मोक्षकारणमित्य- भिहितं इदानीमसकृद्विचार्थापि बुद्धिमांद्यविषयास- क्त्यादिप्रतिबंधेनापरोक्षज्ञानं यस्य न्जायते तस्य मंदा- धिकारिणो निर्गुणब्रह्मोपासनमेव मुख्यं साधनमित्यभि-