अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७० ) . अपरोक्षानुभूतिः । भा.टी. देहभी प्रपञ्चस्वरूपहै और प्रपञ्चके अध्यस्त होनेसे पूर्व जन्मके कर्म्म कहां यदि कहो साक्षात् श्रुति कर्म्मभोगको कहै है तहां ऐसा जानना कि जिनको तत्त्वज्ञान नहीं हुआहै अज्ञानी हैं उनके बोध न करानेके वास्ते श्रुति कहेहै॥९७॥ क्षीयंतेचास्यकर्म्माणि तस्मिन्दृष्टेपरा- वरे॥ बहुत्वंतन्निषेधार्थं श्रुत्यागीतंचय- त्स्फुटम् ॥ ९८ ॥ सं. टी. किंतर्हि ज्ञानिबोधार्थं वक्ति श्रुतिरितिचेदु- च्यते क्षीयंतइति “भिद्यते हृदयग्रंथिश्चिद्यंते सर्वसंश- याः॥ क्षीयंते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे” इतिश्रु- त्या कर्माणीति बहुत्वं यत् स्फुटं गीतं तत्तन्निषेधार्थं प्रारब्धाभावप्रतिपादनार्थं अन्यथा संचितक्रियमाणा- पेक्षया कर्मणीति द्वित्वं गेयं तथा न गीतमतो ब्रह्मा- त्मसाक्षात्कारात् चिज्जडग्रंथिभेदेन संचितक्रियमाण- प्रारब्धाख्यत्रिविधकर्मक्षयांते परमपुरुषार्थं ज्ञानिबोधार्थं श्रुतिर्वक्तीतिभावः ॥ ९८ ॥ भा. टी. जो कर्म्म श्रुतिनें प्रतिपादन कियाहै वह सम्पूर्ण परात्पर परमात्माके दर्शन करनेसे अर्थात् तत्त्वज्ञान होनेसे नष्ट होजाता है सञ्चित, क्रियमाण, प्रारब्ध, तीन प्रकारका कर्म्म श्रुतियोंमें कहागयाहै सो कर्म्मका अभाव प्रतिपादन करनेके अर्थ बहुत्व दरसाया ॥ ९८ ॥