भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ७४ ) अपरोक्षानुभूतिः । रहरूपं साधनं च विधाय श्रद्धयाचार्योक्तप्रकारेण निर्गुणं ब्रह्मैव निदिध्यासेदित्याह नित्येति स्पष्टम् ॥ १०१ ॥ भा. टी. निदिध्यासनके विना सच्चिदानन्द ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होयहै इसकारण ब्रह्मज्ञानके जाननेकी इच्छा करनेवाला बहुतकालतक मङ्गलके अर्थ निदिध्यासन करै ॥ १०१ ॥ यमोहिनियमस्त्यागो मौनंदेशश्चका- लता ॥ आसनं मूलबंधश्च देहसाम्यं च दृक्स्थितिः ॥ १०२ ॥ प्राणसंयमनं चैव प्रत्याहारश्च धारणा ॥ आत्म- ध्यानं समाधिश्च प्रोक्तान्यंगानि वै क्रमात् ॥ १०३ ॥ सं.टी. ननु कानि तान्यंगानि यैः सह निदिध्यासनं कर्त्तव्यमित्यपेक्षायां तानि निर्दिशति यमइति द्वाभ्याम् उत्तानाथावुभावपि श्लोकौ ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ भा. टी. यम, नियम, त्याग, मौन, देश, काल, आसन, मूलबन्ध, देहसाम्य, दृक्स्थिति, प्राणसंयमन, प्रत्याहार, धारण, आत्मध्यान, समाधि, यह सम्पूर्ण अङ्ग क्रमसे कहे हैं ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ सर्वं ब्रह्मेति विज्ञानादिंद्रियग्रामसंय- मः ॥ यमोयमिति संप्रोक्तोऽभ्यसनी- योमुहुर्मुहुः ॥ १०४ ॥ -