अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) अपरोक्षानुभूतिः अभ्रेषु सत्सु धावत्सु सोमो धावति भाति वै ॥ तद्वदा० ॥ ८४ ॥ सं. टी. अभ्रेष्विति ॥ ८४ ॥ भा. टी. जिस प्रकार आकाशमें मेघोंके दौडनेसे चन्द्रमा दौडतासा मालूम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मा में देहका ज्ञान है ॥ ८४ ॥ यथैवदिग्विपर्यासो मोहाद्भवति कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८५ ॥ सं. टी. यथेति : यथावृक्षेत्यादिश्लोकानां स्फुटार्थ त्वात्पिष्टपेषणतुल्यत्वेन न व्याख्यानं कृतम् ॥ ८५ ॥ भा. टी. जिस प्रकार मोह वशसे किसीको दिशाओंमें भ्रम होय है तिसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञान है ॥ ८५ ॥ यथाशशी जले भाति चंचलत्वेन कस्य चित् ॥ तद्वदा० ॥ ८६ ॥ सं. टी. यथाशशीति शशीत्युपलक्षणं सूर्यादीना- मपि शेषं स्पष्टम् ॥ ८६ ॥ भा. टी. जिस प्रकार किसीको किसी समय जलके हिलनेसे चन्द्रका प्रतिबिम्ब हिलनेसे चन्द्रमा हिलैहै ऐसा बोध होय इसी प्रकार अज्ञान वशसे आत्मामें देहका ज्ञानहै ॥ ८६ ॥