भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ५८ ) अपरोक्षानुभूतिः । तन्तुओंको पट मानै है तिसी प्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७१ ॥ कनकं कुंडलत्वेन तरंगत्वेनवैजलम् ॥ विनिर्णीता० ॥ ७२ ॥ सं. टी. कनकमिति ॥ ७२ ॥ भा. टी. जिस प्रकार अज्ञानी पुरुष सुवर्णकूं कुंडल मानै है और जलको तरङ्गरूप मानै है तिसी प्रकार आत्माको देहरूप निर्णय करै है ॥ ७२ ॥ पुरुषत्वेयथास्थाणुर्जंलत्वेनमरीचिका ॥ विनिर्णीता० ॥ ७३ ॥ सं. टी. पुरुषत्व इति ॥ ७३ ॥ भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष शाखाहीन वृक्ष अर्थात् ठूंठवृक्षको पुरुषरूप मानैहै और मरुमरीचिकाको जलरूप मानै है तिसी प्रकार आत्माको देह रूप निर्णयकरै है ॥ ७३ ॥ गृहत्वेनैव काष्ठानिखड्ग त्वेनैवलोहता ॥ विनिर्णीता० ॥ ७४ ॥ सं. टी. गृहत्वेनेति सर्पत्वेनेत्यादि पंचानामप्येतेषां श्लोकानामर्थः स्फुटतर एवास्त्यतो न व्याख्यानं कृतम् ॥ ७४ ॥