अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५७) देहव्यतिरिक्तात्मबोधार्थं विवेकिनस्तु व्यर्थ एवेति सह- दृष्टांतमाह यथेति तत्राऽबुधैरित्यऽकारप्रश्लेषे मुधैवार्कियते अपि तु नेति काकुव्याख्यानम् अन्यत्सर्वं सुगमम्॥६९॥ भा. टी. यदि आत्मा सदा निष्प्रपञ्च भासमान होयहै तब आत्मा और देहका भेद क्यों कर दिखायाहै । ऐसी शंका होनेपर कहें हैं । जैसे कुम्भ मृत्तिकामय होयहै तिसीप्रकार देह चैतन्यस्वरूप आत्ममय होयहै इसीकारण ज्ञानी पुरुषको तौ आत्मा और देहका भेद मिथ्याहै ॥ ६९ ॥ सर्पत्वेनयथारज्जूरजतत्वेनशुक्तिका॥ विनिर्णीताविमूढेन देहत्वेनतथात्मता७०॥ सं. टी. इदानीमविवेकिनः कल्पितदेहेतादात्म्यं स- दृष्टांतमाह सर्पत्वेनेति ॥ ७० ॥ भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष रज्जुको सर्प मानलेयहै और सीपीको चांदी मानलेयहै इसीप्रकार आत्माको देह अ- ज्ञानीकी कल्पनारूप निर्णय करै है ॥ ७० ॥ घटत्वेनयथापृथ्वी पटत्वेनैवतंतवः ॥ विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्म- ता ॥ ७१ ॥ सं. टी. घटत्वेनेति ॥ ७१ ॥ भा. टी. जैसे अज्ञानी पुरुष मृत्तिकाको घट मानैहै और