अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ४९ ) सं. टी. नन्वयंलोक एव तत्कारणे सति कथं शोका- द्यभाव उच्यत इत्याशंक्य सदृष्टांतमाह अनुभूत इति स्पष्टम् ॥ ५६ ॥ दृष्टांतं विवृण्वन्नुक्तन्यायमन्यत्राप्य- तिदिशति स्वप्न इति अलीको मिथ्या द्वयं स्वप्नजागरणे लये सुषुप्तौ शेषं स्पष्टम् ॥ ५७ ॥ भा. टी. जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें स्वप्न देखाहुआ पदार्थ सम्पूर्ण सत्स्वरूप मालूम पडै है स्वप्नसे दूसरेक्षणमें जगते ही सब असत् स्वरूप हो जाय है इसी प्रकार इस संसारका व्यवहार सत्य मालूम होयहै और असत् स्वरूप होयहै जाग्रत् अवस्था में स्वप्न मिथ्या मालूम होयहै स्वप्ना अवस्थामें जाग्रत मिथ्या मालूम होय है और सुषुप्ति अवस्थामें स्वप्न जाग्रत् दोनों मिथ्या होयहैं इसी प्रकार स्वप्न और जाग्रत् अवस्थामें सुषुप्ति मिथ्या प्रतीत होयहै ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ त्रयमेवं भवेन्मिथ्या गुणत्रयविनिर्मि- तम्॥अस्य द्रष्टा गुणातीतो नित्यो ह्ये- कश्चिदात्मकः ॥ ५८ ॥ सं. टी. उक्तमुपसंहरन्फलितमाह त्रयमिति त्रयं जाग्रदाद्यवस्थात्रयमेव युक्तपरस्परव्यभिचारेण मिथ्या मिथ्यात्वे हेतुः गुणेति गुणत्रयविनिर्मितं मायाकल्पित- मित्यर्थः तर्हि किंसत्यमतआह अस्येति अस्यअवस्था त्रयस्य शेषंस्पष्टम् ॥ ५८ ॥ ३