भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ४८ ) अपरोक्षानुभूतिः सप्तम्यर्थे तस्मिन्नवस्थाविशेषे वै निश्चयेन मोहो भ्रमो नभवेच्च पुनः शोको व्याकुलतापि न भवेत् उभयत्र हेतुः अद्वितीयतः तत्कारणाभावादित्यर्थः ॥ ५४ ॥ भा. टी. जिस अवस्थामें पुरुष. सर्व प्रपंचको आत्मरूप मानै है उस अवस्थामें मनुष्यको अद्वैतज्ञान होनेसे शोक मोह नहीं होयहै ॥ ५४ ॥ अयमात्मा हि ब्रह्मैव सर्वात्मकतया स्थितः ॥ इति निर्धारितं श्रुत्याबृहदा- रण्यसंस्थया ॥ ५५ ॥ सं. टी. शोककारणद्वैताभावे प्रमाणमाह अयमिति “ सवा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयः ” इत्यादिरूपये त्यर्थः । शेषंस्पष्टम् ॥ ५५ ॥ भा. टी. "सवा अयमात्मा ब्रह्मविज्ञानमयः" परमात्मस्वरूप ब्रह्मही सर्वात्मकरूप स्थितहै ऐसा बृहदारण्य उपनिषद्की श्रुतिने निश्चय किया है ॥ ५५ ॥ अनुभूतोऽप्ययंलोकोव्यवहारक्षमोऽपि सन् ॥ असद्रूपो यथास्वप्न उत्तरक्षण- बाधतः ॥ ५६ ॥ स्वप्नोजागरणेऽलीकः स्वप्नेपि जागरो नहि ॥ द्वयमेव लये नास्ति लयोपि ह्युभयोर्न च ॥ ५७ ॥

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