भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ८७ ) सं. टी. अथात्मध्यानं लक्षयति ब्रह्मैवेति सद्वृत्त्या सती प्रमाणांतरबाधायोग्या वृत्तिस्तया वृत्त्या निरालं- बतया देहाद्यनुसंधानराहित्येन स्थितिरवस्थानमित्यर्थः शेषंस्पष्टम् ॥ १२३ ॥ भा. टी. सम्पूर्ण बाधाओंको दूरकर देहानुसन्धान परित्याग पूर्वक सम्पूर्ण ब्रह्ममयहै इसप्रकार ज्ञान करके जो ब्रह्मस्वरूप अवलम्बन कर स्थिति करनाहै उसको आत्मध्यान कहैं हैं इसके होनेसे परम आनन्द प्राप्त होयहै ॥ १२३ ॥ निर्विकारतया वृत्त्या ब्रह्माकारतया पुनः॥ वृत्तिविस्मरणंसम्यक् समाधि- र्ज्ञानसंज्ञकः ॥ १२४॥ सं. टी. अथान्यत्समाधिरूपं पंचदशमंगं लक्षयति निर्विकारतयेति निर्विकारतया विषयानुसंधानरहित- तयांतःकरणवृत्त्या पुनरनंतरमेव ब्रह्माकारतया यत् सम्यक् प्रपंचसंस्काररहितं ध्यातृध्येयाकारवृत्तिशून्यं वृत्तिविस्मरणं द्वैतानुसंधानं स समाधिः पंचदश- मंगमित्यर्थः । ननु वृत्तिविस्मरणस्याज्ञानरूपत्वा- त्कथं समाधित्वमित्याशंक्य ब्रह्मात्मैक्यबोधाभावे के- वलवृत्तिविस्मरणस्य तथात्वेपि न ब्रह्मज्ञानसहितस्य तथात्वमित्याशयेन समाधिं विशिनष्टि ज्ञानसंज्ञकइति ज्ञानमिति संज्ञा यस्य स ज्ञानसंज्ञकः ब्रह्माकारतय

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