अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८८ ) अपरोक्षानुभूतिः । स्फुरणरूप इत्यर्थः उक्तंच " समाधिः संविदुत्पत्तिः परजीवैकतां प्रति" इति ॥ १२४ ॥ . भा. टी. निर्विकार चित्त होकर अपनेको ब्रह्मस्वरूप ज्ञान करके सम्पूर्ण प्रकारके प्रपञ्च भावको परित्याग करना ज्ञानि- योंका समाधि कहावे है ॥ १२४ ॥ इमं चाकृत्रिमानन्दं तावत्साधुसमभ्य- सेत् ॥ वश्यो यावत्क्षणात्पुंसः प्रयुक्तः सन्भवेत्स्वयम् ॥ १२५ ॥ सं. टी. इदानीं यदर्थं सांगमिदं निदिध्यासनमुक्तं तदाह इममिति अकृत्रिमानंदं स्वरूपभूतानंदाभिव्यंजकं निदिध्यासनमित्यर्थः चकाराद्यथाबुद्धि वेदांतविचारम- पीति स्पष्टमन्यत् ॥ १२५ ॥ भा. टी. जबतक पूर्वकहे हुए आनन्दमय ब्रह्मके वशमें नही होय तबतक कृत्रिम आनन्द ( निदिध्यासन ) उत्तम प्रकारसे अभ्यास करे परन्तु जिस समय निदिध्यासनादि द्वारा स्वयं ब्रह्मस्वरूप होजाय उस समय निदिध्यासनादिकका कोई प्रयोजन नहीं ॥ १२५ ॥ ततः साधननिर्मुक्तः सिद्धो भवतियो- गिराट् ॥ तत्स्वरूपं न चैतस्य विषयो मनसोगिराम् ॥ १२६ ॥