भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

४ अर्थसंग्रहः— पदसे उसका भी वारण हो सकता है । अर्थपद नहीं देनेसे अनर्थभूत श्येनादिमें अति- व्याप्ति होगी क्योंकि वह 'श्येनेनाभिचरन् यजेत' इत्यादि वेदप्रतिपाद्य और शत्रुवधरूप प्रयोजनवान् भी है। यद्यपि नरकजनक ही अनर्थ होता है श्येनकर्म नरकजनक नहीं है इसलिये अनर्थ भी नहीं है अत एव चतुर्थाध्याय में श्री जैमिनिजीने भी इष्ट- साधनत्वेन वेदबोधित श्येनकर्मको भी धर्म कहा है, इसलिये अर्थ पदका व्यावत्र्य- श्येन नहीं हो सकता तथापि शत्रुवध नरकजनक है अतः अनर्थफलकत्वात् शत्रुवध द्वारा नरकजनक श्येनकर्म भी अनर्थ है । चतुर्थाध्यायमें साक्षादिष्टसाधन- त्वेन वेदबोधित वधमात्र के अभिप्रायसे ही श्येनकर्मको धर्म कहा है पर वस्तुतः परंपरया वह अनिष्ट (नरक) जनक है इसलिये चतुर्थोध्यायसे विरोध नही होता है । अत एव “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” इस सूत्रमें अर्थ पद सार्थक होता है । जैसे परामर्शसे व्यवहित व्याप्तिज्ञानमें अनुमितिजनकत्व माना गया है इसी तरह शत्रु- वधव्यवहित श्येनकर्ममें भी नरकजनकत्व माननेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । वेदस्य धर्मप्रतिपादकत्वम् । न च 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म' इति सौत्रलक्षणविरोधः चोदनापद- स्य विधिरूपवेदैकदेशपरत्वादिति वाच्यम् । तत्रापि चोदनाशब्दस्य वेद- मात्रपरत्वात् । वेदस्य सर्वस्य धर्मतात्पर्यवत्त्वेन धर्मप्रतिपादकत्वात् । वेदप्रतिपाद्य घटित धर्मके लक्षणमें सूत्रकारोंने जो 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' यह धर्म का लक्षण बनाया इससे विरोध लगता है क्योंकि यहांपर चोदनापदका अर्थ, विधिरूप वेदैकदेश है और उसके मतसे विधिरूप वेदैकदेश प्रतिपादित जो अर्थ वही धर्म है और आपके मतसे वेदप्रतिपादित जो अर्थ वह धर्म है अतः विरोध स्पष्ट है । यह शंका नहीं कर सकते हो क्योंकि सूत्र- कारीय धर्मलक्षणमें चोदनापदका चोदना (विधि) प्रकरणपठित समस्त वेद अर्थ है अतः सूत्रकारके मतसे भी वेदप्रतिपाद्यघटित ही धर्म का लक्षण है इसलिये विरोध नहीं होगा। यहां पर “सोऽरोदीद् यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् । स प्रजापतिरा- त्मनो वपामुदखिदत्” इत्यादि चोदनाशेष वाक्योंसे धर्मप्रतिपादित नहीं है अतः तत्प्रतिपाद्य अर्थमें अतिव्याप्ति होगी यह नहीं कह सकते हैं क्योंकि यह वाक्य भी स्तुत्यादि प्रतिपादन द्वारा धर्मप्रतिपादक है इसलिये चोदना प्रकरण पठित समस्त वेदोंके धर्ममें तात्पर्य होने से समस्त वेद धर्मप्रतिपादक ही है ॥