भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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दीपिकाटीकासहितः । ५ स च यागादिः 'यजेत स्वर्गकाम' इत्यादिवाक्येन स्वर्गमुद्दिश्य पुरुषं प्रति विधीयते । तथा हि—यजेतेत्यत्रास्त्यंशद्वयं यजिधातुः प्रत्ययश्च । प्रत्ययेऽप्यस्त्यंशद्वयाख्यातत्वं लिङ्त्वं च । तत्राख्यातत्वं दशलकारसाधारणं लिङ्त्वं पुनर्लिङ्मात्रे । 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि वाक्य स्वर्गको उद्देश्यकर पुरुषके प्रति यागका विधान करता है । इस वाक्यसे स्वर्गसाधनत्वेन याग-विधानका लाभ होता है परन्तु साधनत्ववाचक कोई पद देखनेमें नहीं आता इसलिये प्रकृतिप्रत्ययका विभागपुरस्सर प्रत्ययांश विभागसे भावनाका प्रतिपादन करते हुए तत्सामर्थ्यसे यागमें स्वर्गसाधनत्व बतलाते हैं । जैसे—'यजेत' यहाँ पर दो अंश हैं यज धातु और प्रत्यय । प्रत्ययमें भी दो अंश ( भाग ) हैं आख्यातत्व और लिङ्त्व उनमें आख्यातत्व (तिङ्त्व ) दश लकारों में है, लिङ्त्व केवल लिङ् में है। भावनाविचारः । उभाभ्यामप्यंशाभ्यां भावनैवोच्यते । भावना नाम भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः । सा द्विधा—शाब्दीभावना आर्थीभावना चेति । दोनों ( आख्यातत्व और लिङ्त्व ) अंशोंसे भावना ही कही जाती है । 'भावनैव'—यहां एवकारसे वैयाकरणाद्यभिमत कर्त्रादि अर्थका निरास होता है । अब भावनासामान्यका लक्षण करते हैं । ( भवितुः ) उत्पन्न होनेवालेका भवना- नुकूल, उत्पत्तिजनक जो ( भावयितुः ) प्रयोजकका व्यापार विशेष वही भावना है । जैसे लोकमें उत्पन्न होनेवाले ओदनकी उत्पत्ति ( विक्लेत्ति ) जनक जो प्रयोजक देवदत्तादिनिष्ठ व्यापार उसीको आर्थी भावना कहते हैं । एवं उत्पद्य- मान देवदत्त प्रवृत्तिकी उत्पत्तिका जनक जो प्रयोजक यज्ञदत्तादिका अभिप्राय विशेषा- त्मक व्यापार, वही शाब्दी भावना है । वेदमें जैसे 'यजेत स्वर्गकामः'—यहांपर उत्पद्यमान याग अथवा स्वर्गके उत्पत्तिजनकका प्रयोजक स्वर्गकामपुरुषनिष्ठ जो व्यापार विशेष है वही आर्थी भावना है । एवं उत्पद्यमान स्वर्गकामपुरुष-प्रवृत्तिकी उत्पत्तिका जनक जो लिङ्का व्यापार विशेष, वही शाब्दी भावना है । इस तरहसे भावनाके दो भेद हुए—शाब्दी भावना और आर्थी भावना । शाब्दीभावना । तत्र पुरुषप्रवृत्त्यनुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः शाब्दीभावना । सा च लिडंशेनोच्यते । लिङ्श्रवणेऽयं मां प्रवर्तयति मत्प्रवृत्त्यनुकूलव्यापार-