भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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१० अर्थसंग्रहः— अपूर्वोंके अनेक भेद हैं तथापि अपूर्वोत्पत्तिमें सहकारी ही सब अङ्ग होते हैं । वेदलक्षणविचारः । अथ को वेद इति चेत् । उच्यते—अपौरुषेयं वाक्यं वेदः । स च विधि-मन्त्र-नामधेय-निषेधा-र्थवादभेदात् पञ्चविधः । धर्म लक्षणमें वेदका प्रवेश है इसलिये वेद क्या है यह प्रश्न उठता है । ( उच्यते ) उत्तर करते हैं—अपौरुषेय वाक्यको ही वेद कहते हैं । वेदके पांच भेद हैं—विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध और अर्थवाद । वेद-लक्षणमें अपौरुषेय पद नहीं देनेसे अस्मदादिकृत वाक्यमें अतिव्याप्ति होगी इसलिये अपौ- रुषेय पद दिया है । वाक्यपद नहीं देनेसे अपौरुषेय आत्मामें अतिव्याप्ति होगी इस लिये वाक्य पद दिया है । दूसरे प्रमाणोंसे अर्थ ज्ञान होने पर जो बनाया जावे उसे पौरुषेय कहते हैं जैसे चक्षुरादि प्रमाणसे घटज्ञान रहनेपर ही हम लोग 'घटमानय' इत्यादि वाक्यका निर्माण करते हैं इससे यह वाक्य पौरुषेय है तद्भिन्न वाक्यको अपौरुषेय कहना चाहिए । प्रश्न करते हैं—तत्र तो वेदको भी ईश्वरने प्रमाणान्तरसे अर्थ जानकर बनाया है इसलिये वेद भी पौरुषेय ही है अपौरुषेय कैसे हो सकता है ? उत्तर करते हैं—प्रमाणान्तरसे अर्थ प्राप्तकर ईश्वर ने वेद नहीं रचा है किन्तु “वेदाध्ययनं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनत्वाद्वर्त्तमानवेदाध्ययनवत्” इन अनुमान से वेदाध्ययन गुरुपरंपरागत है और वेद भी गुरुपरम्परागत ही है और 'यः कल्पः स कल्पपूर्वकः' इस न्यायसे संसार अनादि है और परमेश्वर सर्वज्ञ है इसलिये पूर्व पूर्व कल्पीयवेदको स्मरण कर लोगोंको उपदेश देते हैं निर्माण नहीं करते अतः वेदमें अपौरुषेयत्व सिद्ध हुआ । विधिमीमांसा । तत्राज्ञाताथज्ञापको वेदभागो विधिः । स च तादृशप्रयोजनवदर्थ- विधानेनार्थवान् यादृशं चार्थं प्रमाणान्तरेणाप्राप्तं विधत्ते—यथा ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकाम’ इति विधिर्मानान्तरेणाप्राप्तं स्वर्गप्रयोजनवद्धोमं विधत्ते अग्निहोत्रहोमेन स्वर्गं भावयेदिति वाक्यार्थबोधः । उन वेदोंके भेदोंमें अज्ञात अर्थको समझाने वाले वेद भागको विधि कहते हैं । वह विधि-जो अर्थ ( प्रमाणान्तर ) दूसरे प्रमाणसे ज्ञात नहीं है तादृश अर्थको विधान करती है इसलिये प्रमाणान्तरसे अज्ञात प्रयोजनवद् अर्थके विधानसे ही विधि सार्थक होती है । जैसे दूसरे प्रमाणसे स्वर्गप्रयोजन वाला होम का ज्ञान नहीं है केवल

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