अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ११ “अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः” इसीसे वेद ज्ञात होता है इसलिये इस वेद भागको विधि कहनी चाहिए । यहां पर विधिमें कर्मका ही करणत्वेन अन्वय करके इस वेद का ‘अग्निहोत्रहोमसे स्वर्ग का उत्पादन करे’ यह अर्थ समझना चाहिए । यत्र कर्म मानान्तरेण प्राप्तं तत्र तदुद्देशेन गुणमात्रं विधत्ते—यथा ‘दध्ना जुहोती’त्यत्र होमस्याग्निहोत्रं जुहुयादित्यनेन प्राप्तत्वाद्धोमोद्देशेन दधिमात्रविधानं, ‘दध्ना होमं भावयेद्’ति । यत्र तूभयमप्राप्तं तत्र विशिष्टं विधत्ते—यथा ‘सोमेन यजेते’ त्यत्र सोमयागयोरप्राप्तत्वात्सोमविशिष्टयाग- विधानम् । सोमपदे मत्वर्थलक्षणया सोमवता यागेनेष्टं भावयेदिति वा- क्यार्थबोधः । जिस गुण विधिमें कर्म ( यागादि ) दूसरे प्रमाणसे ही सिद्ध हो वहां पर उसी कर्मको उद्देश करके अप्रधान गुण मात्रका विधान होता है जैसे ‘दध्ना जुहोति’ यहां पर ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्’ इस कर्म विधिसे होम ( याग ) सिद्ध है इस लिये होम को उद्देश कर दधि (गुण) मात्रका विधान होता है । ‘दध्ना जुहोति’—इस वाक्यसे दधिसे हवन करे यह बोध होता है । जहां पर गुण और कर्म दोनों अप्राप्त ( असिद्ध ) हैं वहां दोनों ( गुण विशिष्ट कर्म ) का विधान होता है जैसे ‘सोमेन यजेत’ यहां पर सोम और याग दोनों असिद्ध हैं इसलिये सोमविशिष्ट यागका विधान होता है । यहां पर सोम ( गुण ) मात्रका ही विधान नहीं हो सकता है क्योंकि सोमलता द्रव्य है अतः क्रियात्मक याग सोम नहीं हो सकता इस लिये सोम पदमें मत्वर्थ लक्षणा (सोमको सोमवत् में लक्षणा) करेंगे अर्थात् ‘अर्श आदिभ्योऽ- च्’ इस पाणिनीय सूत्रसे सोमः अस्ति अस्मिन् इस अर्थमें अच् प्रत्यय करेंगे । “सोमवान् यागसे इष्ट ( स्वर्ग ) का उत्पादन करे” यह वाक्यार्थ होता है ॥ वाक्यभेददोषपरिहारः । न चोभयविधाने वाक्यभेदः, प्रत्येकमुभयस्याविधानात्, किन्तु विशि- ष्टस्यैव विधानात् । यहांपर यह शंका उठती है कि गुण और कर्म दोनोंके विधानसे वाक्यभेद होगा और वाक्यभेद किसीको भी इष्ट नहीं है । क्योंकि जहांपर वाक्यभेद होता है वहां आठ दोष होते हैं । जैसे—‘व्रीहिभिर्यजेत यवैर्वा’ यहांपर यदि पहले व्रीहिसे याग किया जाय तो ‘यवैर्वा’ इस शास्त्रमें स्वार्थानुष्ठापकत्व (यवसे अनुष्ठान बतलानेवाला) रूप जो प्रामाण्य है उसका परित्याग करना पड़ता है । (१) और यवशास्त्रमें स्वार्थान- २ अ० सं०