भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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१२ अर्थसंग्रहः— नुष्ठापकत्वरूप अप्रामाण्यका स्वीकार करना पड़ता है। (२) और यवसे अनुष्ठान करनेपर यव शास्त्रमें छोड़ा हुआ प्रामाण्यका स्वीकार करना पड़ता है। (३) और स्वीकृत अप्रामाण्यका परित्याग करना पड़ता है। (४) इस तरहसे यव शास्त्रमें चार दोष हैं ! इसी तरह यदि प्रथम यवसे अनुष्ठान किया जाय तो ब्रीहि शास्त्रमें प्रामाण्यका परित्याग करना पड़ता है। (१) एवं ब्रीहि शास्त्रमें अप्रामाण्यका स्वीकार करना पड़ता है। (२) तथा ब्रीहिसे अनुष्ठान करनेपर ब्रीहि शास्त्रमें पूर्वपरित्यक्त प्रामाण्यका स्वीकार । (३) और ब्रीहि शास्त्रमें पूर्व स्वीकृत अप्रा- माण्यका त्याग करना पड़ता है। (४) इस तरह कुल मिलाकर आठ दोष होते हैं वैसे ही प्रकृतमें वाक्य भेदसे आठदोष होंगे। ब्रीहि यव वाक्यके समान यहांपर भी आठों दोष इष्ट हैं ऐसा नहीं कह सकते हैं क्योंकि वहां ब्रीहि और यवसे पुरोडाश (हवनके लिये पदार्थ) रूप एक ही कार्य होता है इसलिये वाक्यभेद इष्ट है और दूसरी कोई गति नहीं है। प्रकृतमें तो केवल गुणमात्र विधानसे भी काम चल सकता है इसलिये उभय विधानसे वाक्य भेद करना अनुचित है। इस शंकाका अब उत्तर करते हैं जहांपर व्यापार भेदसे प्रत्येक उभय पदार्थ (अलग २ दोनों) का विधान होता है वहींपर व्यापार भेदसे वाक्य भेद होता है। यहां अलग २ दोनों पदार्थोंका विधान नहीं है किन्तु एक ही व्यापारसे गुण विशिष्ट कर्मका विधान होता है इसलिये वाक्यभेद कथमपि नहीं होगा । गुणविध्यादिभेदः । न च 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेते'ति विधिप्राप्तयागोद्देशेन सोम- रूपगुणविधानमेवास्तु, सोमेन यागं भावयेदिति किं मत्वर्थलक्षणयेति वाच्यम् । तस्याधिकारविधित्वेनोत्पत्तिविधित्वासंभवात् । यहांपर यह शंका उठती है कि—ज्योतिष्टोमेन–इत्यादि वाक्यसे सोम याग रूपकर्म सिद्ध है अतः 'सोमेन यजेत' इससे सोमरूप गुणका ही विधान मानना चाहिये विशिष्ट विधानके लिये मत्वर्थमें लक्षणा करनेसे जो गौरव होता है वह भी नहीं होगा 'सोमेन यजेत' इस वाक्यसे 'सोम द्वारा यागकी भावना करे' ऐसा ही अर्थका बोध होगा। इसका उत्तर करते हैं—'ज्योतिष्टोमेन'–यह विधि अधिकार विधि है उत्पत्ति विधि नहीं हो सकती। इसका यह अभिप्राय है कि—कर्मस्वरूप मात्रके बोधकको ही उत्पत्ति विधि कहते हैं और अधिकार विधिके, उत्पत्ति विधि विहित