अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपीकाटीकासहितः । १३
कर्मके फल विशेषके साथ सम्बन्ध मात्रका बोध होता है । जैसे 'आग्नेयोऽष्टा- कपालो भवति' इस उत्पत्ति विधिसे विहित आग्नेय यागके स्वर्गरूप फलके साथ 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इस विधिके सम्बन्ध मात्रका बोध होता है । इसलिये 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामः' यह अधिकार विधि है उत्पत्ति विधि नहीं है । इसी तरह 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामः' इससे सम्बन्ध मात्रका विधान होता है । इसलिये यह भी अधिकार विधि है । उत्पत्ति विधि नहीं है । अतः सोम- याग स्वरूपका ज्ञानके लिये विशिष्ट विधान करना आवश्यक है । उभयविधित्वम् । ननु 'उद्भिदा यजेत पशुकाम' इत्यस्येव ज्योतिष्टोमेनेत्यस्याप्युत्पत्त्यधि- कारविधित्वमस्त्विति चेत् । न । दृष्टान्ते उत्पत्तिवाक्यान्तराभावेनान्यथा- नुपपत्त्या तथात्वाश्रयणात् । किञ्च ज्योतिष्टोमेनेत्यस्योभयविधित्वेऽनेनैव यागस्तस्य फलसंबन्धोऽपि बोधनीय इति सुदृढो वाक्यभेदः । तद्वरं सोम- पदे मत्वर्थलक्षण्या विशिष्टविधानम् । यहांपर पुनः शंका होती है कि जैसे 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यह उद्भिद् नामक यागका बोधक है । इसीलिये उत्पत्ति विधि होनेपर भी इससे विहित उद्भिद् यागके पशुरूप फलके साथ सम्बन्धका भी बोध होता है अतः 'उद्भिदा यजेत' यह विधि = उत्पत्ति और अधिकार दोनों विधि हैं इसलिये इस वाक्यसे उद्भिन्नामक यागसे पशु प्राप्त करे, यह शाब्द बोध होता है । इसी तरह 'ज्योतिष्टोमेन' यह भी उत्पत्ति और अधिकार विधि हो सकती है । इसका उत्तर करते हैं—(दृष्टान्ते ) 'उद्भिदा यजेत' यहांपर ( उत्पत्ति ) याग स्वरूपको बतलानेवाला कोई दूसरा वाक्य नहीं है और ( अन्यथानुपपत्त्या ) याग स्वरूप ज्ञानके विना, यागका संबन्ध विशेषके साथ अन्वय का बोध नहीं हो सकता है । इसलिये अगत्या वहां दोनों विधि मानते हैं । पुनः शंका होती है कि—ज्योतिष्टोमेन' इस वाक्यको भी कर्म और फल उभयविधा- यकत्व मानना चाहिये और 'सोमेन यजेत' यहांपर मत्वर्थलक्षणाके विना ही गुणका विधान होगा । इसका उत्तर करते हैं ( किञ्चेति ) यदि 'ज्योतिष्टोमेन' इसीसे कर्म और फल दोनोंका विधान मानाजाय तो इसी ( ज्योतिष्टोमेन ) वाक्यसे याग और यागका फलके साथ संबन्ध भी समझना होगा तब वाक्य भेद अनिवार्य होजायगा । क्योंकि 'श्रोतव्यापारनानात्वे शब्दानामतिगौरवम् । एकोक्त्यवसितानां तु नार्थी-