भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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१४ अर्थसंग्रहः— क्षेपो विरुध्यते” इसका अर्थ यह है कि शब्दोंका श्रौत (शब्दोपात्त) व्यापार अनेक रहे तो अतिशय गौरव होता है (तु) किन्तु (एकोक्त्यवसितानाम्) एक शक्तिसे सम्बन्ध अर्थात् एक ही व्यापार जहाँ है वहांपर दूसरे अर्थका आक्षेप विरुद्ध नहीं होता। प्रकृतमें दोनोंके विधान करनेसे व्यापारद्वय मानना ही पड़ेगा अतः गौरवरूप वाक्यभेद अवश्य होगा। किन्तु ‘सोमेन यजेत’ इसको गुणविशिष्ट यागविधायकत्व माननेपर वाक्यभेद दोष नहीं होता क्योंकि विशिष्ट विधिमें विशेष्यका विधान- फलितार्थ रहता है अतः श्रूयमाण व्यापार द्वारा विशेषणका पृथक् विधान नहीं होनेसे भिन्न व्यापार नहीं करना पड़ता। ‘सोमेन यजेत’ इस वाक्यको विशिष्ट विधायकत्वमें यद्यपि मत्वर्थ लक्षणा दोष होता है तथापि वाक्यभेदसे लक्षणारूप दोष न्यून है क्योंकि लक्षणा पदका दोष है और वाक्यभेद वाक्यका दोष है। पददोष और वाक्यदोषमें पददोषको ही स्वीकार करना चाहिये। इसलिये ‘ज्योतिष्टोमेन’ इसको उभय विधायक माननेसे जायमान वाक्यभेद दोषकी अपेक्षा सोमपदमें मत्वर्थलक्षणा मानकर (सोमेन) इस वाक्यसे सोमविशिष्ट यागका विधान ही श्रेष्ठ है। विधिश्चतुर्विधः। विधिश्चतुर्विधः-उत्पत्तिविधि-विनियोगविधि-रधिकारविधिः-प्रयोग- विधिश्चेति। विधि के चार भेद हैं। उत्पत्तिविधि, विनियोगविधि, अधिकारविधि और प्रयोगविधि। उत्पत्तिविधिः। तत्र कर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिरुत्पत्तिविधिः। यथा ‘अग्निहोत्रं जुहोती’ति। अत्र च विधौ कर्मणः करणत्वेनान्वयः, अग्निहोत्रहोमेनेष्टं भावयेदिति। उनमें कर्म (यागादि) स्वरूप मात्रके बोधक विधिको उत्पत्तिविधि कहते हैं। यहांपर मात्रपदसे यह सूचित होता है कि उत्पत्तिविधिसे कर्मको फलके साथ सम्बन्ध- का बोध नहीं होता है। ‘उद्भिदा यजेत पशुकामः’ यह श्रौत अधिकार विधि ही है। परन्तु यागस्वरूप बोधक कोई दूसरी विधि नहीं है इसलिये उत्पत्ति विधिका फलितार्थ लाभ होता है, इसलिये इस लक्षणमें कोई दोष नहीं लगता है। उदाहरण बतलाते हैं जैसे ‘अग्निहोत्रं जुहोति’ इस विधिमें कर्म (अग्निहोत्र) का करणत्वेन अन्वय होता