भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 84 में से

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पृष्ठ 21

दीपिकाटीकासहितः । १५ है इसलिये इस वाक्यसे 'अग्निहोत्रनामके यागसे इष्टका उत्पादन करे' इस अर्थ- का बोध होता है । वह कौनसा इष्ट पदार्थ है ? इस तरह की आकांक्षा होनेपर 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इस अधिकार विधिसे अवगत स्वर्गरूप इष्ट संबन्ध की उपपत्ति होती है । यहांपर यह शंका होती है कि 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस वाक्यमें, इष्टबोधक कोई पद नहीं है तब 'अग्निहोत्र होमसे इष्टका उत्पादन करे' यह वाक्यार्थ बोध कैसे होगा ? इसका यह उत्तर है कि इष्टके विना विधिवाक्य, यागमें पुरुष का प्रवर्तक नहीं हो सकता अतः विधिसे इष्टका आक्षेप होगा । यागस्य रूपद्वयम् । ननु यागस्य द्वे रूपे द्रव्यं देवता च । तथा च रूपाश्रवणेऽग्निहोत्रं जुहोतीति कथमुत्पत्तिविधिः ? अग्निहोत्रशब्दस्य तु तत्प्रख्यन्यायेन नामधेयत्वादिति चेत् । न । रूपाश्रवणेऽप्यस्योत्पत्तिविधित्वात् । अन्यथा रूपश्रवणात् 'दध्ना जुहोती' त्ययमेवोत्पत्तिविधिः स्यात् । तथा च 'अग्नि- होत्रं जुहोती'ति वाक्यमनर्थकं स्यात् । यहांपर यह शंका होती है कि—यागके दो रूप होते हैं द्रव्य–और देवता । 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस विधिमें द्रव्य या देवताका श्रवण नहीं है अतः यह उत्पत्ति विधि कैसे हुई ? यद्यपि अग्निहोत्र शब्दका श्रवण है तथापि तत्प्रख्य ( जिसका स्वरूप आगे बतलायेंगे ) न्यायसे वह अग्निहोत्र यागका नाम है । इसका उत्तर करते हैं- प्रकृतमें रूपका श्रवण न होनेपर भी इसको उत्पत्ति विधि माननी चाहिये । यहां यह अभिप्राय है कि इस वाक्यमें यागरूपके श्रवण न होनेपर भी बिना रूपके उत्पत्ति विधि नहीं हो सकती अतः सामान्यतः रूप की कल्पना करते हैं । कौन सा वह रूप है इस तरह विशेष आकांक्षा होनेपर 'दध्ना जुहोति' इस गुण विधिसे दधिरूप द्रव्य और 'अग्निर्ज्योति' इत्यादि मन्त्रवर्णसे अग्निरूप देवताका ज्ञान होता है । अतः यहांपर विशेषतया कर्मरूपके श्रवण न होनेपर भी यागरूप सामान्य कर्म मात्रका बोधक होनेसे उत्पत्ति विधि हो सकती है । ( अन्यथा ) रूपके श्रवण होने से ही यदि उत्पत्ति विधि हो तो 'दध्ना जुहोति' यह दधिरूप द्रव्यात्मक कर्मरूपके श्रवण- से अग्निहोत्र याग रूपकर्म की उत्पत्ति विधि होगी तब 'अग्निहोत्रं जुहोति' यह वाक्य अनर्थक हो जायगा एवं 'अग्निहोत्रं जुहोति' यह अग्निरूप गुणका विधायक भी नहीं हो सकता है क्योंकि 'अग्निर्ज्योति' इस अग्निवर्णसे भी अग्निरूप गुण प्राप्त है अतः 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' इस न्यायसे गुण-विधायक

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