भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

साध्यत्वेन अन्वय होगा और इष्टकी भावनामें होमका करणत्वेन अन्वय होगा । तब दो विरुद्ध त्रिककी आपत्ति होगी । जैसे 'दध्ना जुहोति' यहां पर एक ही बार धातु उच्चरित है इसलिये तन्त्रसे जैसे एक ही बार उच्चरित शब्दका अनेक अर्थ होता है ऐसे ही दधि और किञ्चिद्विषमें अन्वय करना होगा तब होममें उपादेयत्व विधेयत्व और अप्रधानत्व इन तीनोंकी और उद्देश्यत्व, अनुवाद्यत्व और प्रधानत्व इन तीनोंकी आपत्ति होगी । क्योंकि इष्टमें जब होमका अन्वय होता है तब इष्ट को उद्देश्य करके होमका उपादान करते हैं । इष्ट ( स्वर्गादि ) के लिये होम आवश्यक है इसलिये होममें उपादेयत्व रहा ( १ ) एवं इष्टको अनुवाद करके होमका विधान करते हैं इसलिये विधेयत्व रहा ( २ ) और होम साधन है इसलिये अप्र- धानत्व रहा ( ३ ) इसी तरहसे दधिमें जब अन्वय करते हैं तब होमको उद्देश्य करके दधिका उपादान करते हैं इसलिये होममें उद्देश्यत्व रहा ( १ ) तथा होमको अनुवाद करके दधिका विधान करते हैं इसलिये अनुवाद्यत्व रहा ( २ ) और होम साध्य है इसलिये प्रधानत्व भी रहा ( ३ ) इस तरह विरुद्ध त्रिकद्वयकी आपत्ति हुई । इसलिये 'दध्ना जुहोति' यहांपर दधि शब्द गुणपरक नहीं है । इस पूर्वपक्षका उत्तर करते हैं कि जहांपर एकको ही समानकालमें तन्त्रसे साध्यत्वेन और करणत्वेन अन्वय होता हो वहीं पर विरुद्ध त्रिकद्वयका आपादन ( आपत्ति ) दोष हो सकता है, जैसे— 'वाजपेयेन स्वाराज्यकामो यजेत' यहांपर वाजपेय शब्दका अर्थ होता है पान करने योग्य सुरा द्रव्य । तब वाक्यसे यदि वाजपेयरूप गुणका विधान करें तो वाजपेय शब्द को मत्वर्थमें लक्षणा करनी होगी अतः स्वाराज्य (स्वर्गसाम्राज्य) रूप फल और वाजपेयरूप गुण दोनोंका तन्त्रसे एक ( वाजपेयोऽस्ति अस्मिन् ) ही समय में धात्वर्थमें अन्वय होता है इस तरह पूर्वपक्ष द्वारा वहां पर विरुद्ध त्रिकद्वयका आपादन ( आपत्ति ) करते हुए वाजपेयको नामधेयत्वका सिद्धान्त किया गया है । परन्तु प्रकृतमें तन्त्रसे धात्वर्थ होमका साध्यत्वेन और साधनत्वेन अन्वय नहीं करते हैं किन्तु साध्यत्व से ही करते हैं इसलिये होममें उद्देश्यत्व, अनुवाद्यत्व और प्रधानत्व ही । उपादेयत्व ( ग्रहण ) विधेयत्व ( विधान ) और अप्रधानत्व नहीं है अतः विरुद्ध त्रिकद्वयकी आपत्ति नहीं हो सकती । इससे यह सिद्ध हुआ कि गुण विधिमें धात्वर्थ होमका साध्यत्वेनैव अन्वय होता है । यदि गुण विधिमें धात्वर्थका साध्यत्वेनैव अन्वय होगा तब 'दध्नेन्द्रियकामस्य जुहुयात्' यहांपर होमका साध्यत्वेनैव अन्वय होनेसे 'दधिसे होम करे' इतना ही अर्थ होगा । इन्द्रियका साध्यत्वेन अन्वय नहीं होनेसे इन्द्रिय