अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ अर्थसंग्रहः— फल ( इष्ट ) नहीं होगा। यदि इस वाक्यसे गुणका विधान नहीं मानेंगे तो दधिपद व्यर्थ हो जायगा। यदि गुण और होम दोनोंका विधान मानेंगे तो पूर्वोक्तरीतिसे विरुद्ध त्रिकद्वयकी आपत्ति होगी। इसलिये कहींपर धात्वर्थका आश्रयत्व सम्बन्धसे भी अन्वय होता है। अथवा—'क्वचिदाश्रयत्वेनापि' इस ग्रन्थका व्याख्यान इस तरह करना चाहिये कि गुणविधिमें सभी जगह धात्वर्थका साध्यत्वेनैव अन्वय करना चाहिए। जहांपर दध्यादिगुण के करणत्वकी उपस्थिति तृतीयासे होती है वहां दध्यादिगुणका करणत्व प्रत्ययार्थ हुआ और प्रकृत्यर्थके प्रति प्रत्ययार्थ प्रधान होता है। अतः दध्यादिकरणत्व दधिके प्रति भी प्रधान है अतः उसका फलभावनामें करणत्वेन अन्वय होगा। एतादृशस्थलमें धात्वर्थका आश्रयत्व ( वृत्तित्व ) सम्बन्धसे अन्वय होता है। इस मतमें क्वचित् शब्दका अर्थ होगा कि जहांपर दध्यादिगुणकरणत्वका करणत्वेन फलभावनामें विधान होता है वहां पर। तब 'दध्नेन्द्रिय' यह वाक्य गुण विधायकही नहीं है इसलिये यहां आश्रयत्व सम्बन्धसे अन्वय न होनेपर भी कोई दोष नहीं है। 'दध्नेन्द्रियकामस्य जुहुयात्' इसका अर्थ होगा कि दधि करणत्वसे इन्द्रियरूप फलकी भावना करे। ( तच्च ) तृतीया से उपस्थित दधिक- रणत्व किसमें है यह आकांक्षा होनेपर समीपवर्ति धात्वर्थ होमका आश्रयत्व ( वृत्तित्व ) सम्बन्धसे अन्वय होता है। तब 'होमवृत्ति दधिकरणत्वसे इन्द्रियकी भावना करे' यह वाक्यार्थ बोध होगा। यहांपर यह अभिप्राय है कि कर्त्ता के व्यापारके बिना कारण नहीं रह सकता है और होम वाक्यान्तरसे विहित है अतः होम और दधि गुण दोनोंका विधान नहीं हो सकता है होममें दधि सम्बन्धका विधान करेंगे तो इन्द्रियरूप फलका उपादान व्यर्थ होगा। यदि होममें फल सम्बन्धका विधान करेंगे तो दधिपद व्यर्थ हो जायेगा। फल और गुण दोनोंका सम्बन्ध विधान नहीं हो सकता क्योंकि प्राप्त कर्ममें उभयविधानसे वाक्यभेद होता है और 'प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातुं शक्यते गुणः। अप्राप्ते तु विधीयन्ते बहवोऽप्येकयत्नतः' इस वचनसे विरोध भी होगा। इस वचनमें कर्मपद द्रव्या- दिका उपलक्षण है। गुणपद प्रधानका उपलक्षण है तब यह अर्थ होगा कि कर्म या द्रव्यादिगुण वाक्यान्तरसे प्राप्त रहे तो उसमें अनेक गुण या प्रधानका विधान नहीं हो। अप्राप्त में तो एक यत्नसे अनेकोंका विधान हो सकता है। अतः प्रकृत में तृतीयासे उपस्थित दधिकरणत्वमें होमनिरूपितत्वेन फल भावनाके प्रति करणत्वका विधान किया जाता है।