भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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दीपिकाटीकासहितः । १९ विधेः श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि । एतस्य विधेः सहकारिभूतानि षट्प्रमाणानि—श्रुति-लिङ्ग-वाक्य- प्रकरण-स्थान-समाख्यारूपाणि । एतत्सहकृतेनानेन विधिनाङ्गत्त्वं परो- देशप्रवृत्तकृतिसाध्यत्वरूपं पारार्थ्यापरपर्यायं ज्ञाप्यते । विनियोगविधिके सहकारी छै प्रमाण हैं। जैसे-श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या । इसके (सहकृत) साथ होकर निवियोग विधि अंगत्वको समझाती है । ( परोद्देश प्रवृत्त ) स्वर्गादि फलके उद्देश्यसे स्वर्गादिकारणीभूतयागादिमें प्रवृत्त पुरुषका ( कृतिसाध्य ) यत्नव्याप्य जो हो उसीको अंग कहते हैं । जैसे स्वर्गादि फलके लिये दर्शादियागमें प्रवृत्त पुरुषका यत्नव्याप्य ( साध्य ) प्रयाजादि हैं इसलिये प्रयाजादि उस ( दर्श ) का अङ्ग है अंगत्वका ही पर्याय पारार्थ्य है । तत्र निरपेक्षो रवः श्रुतिः । सा च त्रिविधा—विधात्री, अभिधात्री, विनियोक्त्री च । तत्राद्या लिङाद्यात्मिका । द्वितीया व्रीह्यादिश्रुतिः । यस्य च शब्दस्य श्रवणादेव संबन्धः प्रतीयते सा विनियोक्त्री । श्रुतिका लक्षण करते हैं—प्रमाणान्तरकी जो अपेक्षा नहीं रखे ऐसे रव ( शब्द ) को श्रुति कहते हैं । रवमात्रको श्रुति कहनेसे घटादि शब्दमें अतिव्याप्ति होगी अतः निरपेक्ष कहा । घटादि शब्द तो प्रमाणान्तर सापेक्ष है । इस श्रुतिके तीन भेद हैं । विधात्री ( विधान करनेवाली ) अभिधात्री ( अभिधान करनेवाली ) और विनियोक्त्री ( विनियोग करनेवाली ) । उनमें लिङा- दिको विधात्री कहते हैं । व्रीह्यादि शब्दको अभिधात्री कहते हैं । और जिस शब्दके श्रवणमात्रसे ही सम्बन्ध ज्ञान हो उसे विनियोक्त्री कहते हैं । विनियोक्त्री श्रुतिस्त्रिधा । सापि त्रिविधा—विभक्तिरूपा, एकाभिधानरूपा, एकपदरूपा चेति । तत्र विभक्तिश्रुत्या अङ्गत्त्वं यथा ‘व्रीहिभिर्यजेते’ति तृतीयाश्रुत्या व्रीहीणां यागाङ्गत्त्वम् । तदपि पुरोडाशप्रकृतितया । यथा पशोर्हृदयादिरूपहविः- प्रकृतितया यागाङ्गत्त्वम् । विनियोक्त्री श्रुति भी तीन प्रकार की है । जैसे विभक्तिरूपा, एकाभिधानरूपा और एकपदरूपा । उनमें विभक्ति श्रुतिसे जो अंग होता है उसका उदाहरण देते हैं । जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत’ यहां तृतीया श्रुतिसे व्रीहि यागका अङ्ग होता है। व्रीहिसे पुरोडाश ( हविर्विशेष ) बनता है और पुरोडाश यागका अङ्ग है इसलिये व्रीहि भी यागका