अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
पृष्ठ 26, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ अर्थसंग्रहः— अंग होता है। पुरोडाशकी प्रकृति होनेसे व्रीहिके यागांग होनेमें दृष्टान्त बतलाते हैं— जैसे यागका अंगभूत पशुहृदयादि रूप हविष्की प्रकृति होनेसे ही पशु अङ्ग होता है। वह साक्षात् यागका अंग नहीं है किन्तु 'अथ हृदयस्याग्रेऽवद्यत्यथ वक्षसः' इस शास्त्रसे हृदयादिरूप अवयव ही साक्षात् अंग है। इसी तरह साक्षात् अंग पुरोडाश है और उसके द्वारा व्रीहि भी यागांग होता है। तृतीयाविभक्तिरूपाया उदाहरणम्। 'अरुणया एकहायन्या गवा सोमं क्रीणाति' त्यस्मिन् वाक्ये आरुण्य- स्यापि तृतीयाश्रुत्या क्रयाङ्गत्वम्। तदपि गोरूपद्रव्यपरिच्छेदद्वारा न तु साक्षात्, अमूर्तत्वात्। 'अरुणया' इस वाक्यमें तृतीया श्रुतिसे (आरुण्य) रक्तवर्ण भी सोम क्रयणका अंग होता है। आरुण्य अमूर्त (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मनको मूर्त कहते हैं इससे भिन्न) है इससे क्रयण नहीं हो सकता इसलिये वह साक्षात् अङ्ग नहीं हो सकता है किन्तु क्रयणका साक्षात् हेतुभूत गोरूपद्रव्यपरिच्छेद (दूसरेकी व्यावृत्तिकर द्रव्यका निश्चय) द्वारा अङ्ग होता है। यहां पर यह अभिप्राय है कि कारकका क्रियामें ही अन्वय होता है इस नियमसे आरुण्यमें तृतीयाका श्रवण होनेके कारण पहले क्रयण क्रियामें ही साक्षात् अन्वय होगा परन्तु आरुण्य गुणसे क्रयण बाधित है इसलिए पश्चात् गोरूप द्रव्यमें अन्वय होगा। द्वितीयारूपाया विनियोक्त्र्या उदाहरणम्। 'व्रीहीन्प्रोक्षती'ति प्रोक्षणस्य व्रीह्यङ्गत्वं द्वितीयाश्रुत्या। तच्च प्रोक्षणं न व्रीहिस्वरूपार्थम्, तस्य तेन विनाप्युपपत्तेः। किन्त्वपूर्वसाधनत्वप्रयुक्तम्। व्रीहीनप्रोक्ष्य यागानुष्ठानेऽपूर्वानुपपत्तेः। एवं सर्वेष्वङ्गेष्वपूर्वप्रयुक्तमङ्गत्वं बोध्यम्। 'व्रीहीन्प्रोक्षति' यहां पर द्वितीया श्रुतिसे प्रोक्षण व्रीहिका अङ्ग होता है। व्रीहिका अङ्गभूत प्रोक्षण व्रीहिस्वरूपार्थ नहीं है क्योंकि प्रोक्षणके विना भी व्रीहिका स्वरूप पहलेसे ही निष्पन्न है। किन्तु प्रोक्षणसे अपूर्वकी उत्पत्ति होती है अतः प्रोक्षण अपूर्वका कारण होनेसे व्रीहिका अङ्ग होता है। जैसे अनुपनीत ब्राह्मण बालकके द्वारा किया गया वेदाध्ययनसे अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती इसी तरह व्रीहि प्रोक्षणके विना यागानुष्ठानसे अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती है। इसी तरह अवघातादि सभीको अपूर्व प्रयुक्त ही अङ्ग समझना चाहिए।