अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः। २९ द्वितीयाविनियोक्त्र्या उदाहरणम् । एवम् 'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्त' इत्यत्र द्विती- याश्रुत्या मन्त्रस्याश्वाभिधान्यङ्गत्वम् । 'इमामगृभ्णन्' इस मन्त्र का यह अर्थ है कि (ऋतस्य) सत्य फलसम्बन्धि (इमां रशनां) बन्धनरज्जुको (अगृभ्णन्) ग्रहण किया । इस वाक्यमें (अश्वा- भिधानीम्) इस द्वितीया श्रुतिसे यह मन्त्र अश्वाभिधानी (अश्ववन्धनरस्सी) का अङ्ग होता है । सप्तमीविभक्तिविनियोक्त्र्या उदाहरणम् । 'यदाहवनीये जुहोति' त्याहवनीयस्य होमाङ्गत्वं सप्तमीश्रुत्या । एव- मन्याऽपि विभक्तिश्रुत्या विनियोगो ज्ञेयः । "यदाहवनीये जुहोति" यहां पर सप्तमी श्रुतिसे आहवनीय (अग्नि विशेष को होमका अंग समझना चाहिये । उससे 'आहवनीय अग्निमें होम करता है' यह बोध होता है, इसी तरह विभक्ति श्रुतिसे दूसरेको भी विनियोग (अंग) जानना चाहिये । जैसे 'दध्ना जुहोति, पयसा जुहोति' इत्यादिमें तृतीया श्रुतिसे दधि और दूध प्रभृति, होमका अंग होता है । 'पशुना यजेते' त्यत्रैकत्वपुंस्त्वयोः समानाभिधानश्रुत्या कारकाङ्गत्वम् । यजेतेत्याख्याताभिहितसंख्याया भावनाङ्गत्वं समानाभिधानश्रुतेरेव पद- श्रुत्या च यागाङ्गत्वम् । एकाभिधानरूप और एकपदरूप विनियोक्त्रीका उदाहरण देते हैं । 'पशुना- यजेत' यहांपर (टा) प्रत्ययके ही करणरूपकारक, पुंस्त्व और एकत्वसंख्या ये तीन अर्थ हैं इसलिये टारूप एकाभिधान (एकवाचक) श्रुतिसे एकत्व और पुंस्त्व ये दोनों करणरूप कारकके अंग होते हैं और 'पशुना' इस एकपदश्रुतिसे पशुरूप द्रव्यके अंग होते हैं । इसी तरह 'यजेत' यहांपर आख्यात (तङ्) के ही भावना और एकत्व संख्या अर्थ हैं । इसलिये (तरूप) एकाभिधानश्रुतिसे एकत्वसंख्या भावना- की अंग होती है और (यजेत) इस एक पदश्रुतिसे संख्या यागकी अंग होती है । अमूर्ताया अपि भावनाङ्गत्वम् । न चामूर्तायास्तस्याः कथं भावनाङ्गत्वमिति वाच्यम् । कर्तृपरिच्छेद- द्वारा तदुपपत्तेः । कर्ता चाक्षेपालभ्यः ।