अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ | अर्थसंग्रहः— | भावनाया आख्यातवाच्यत्वम् । आख्यातेन हि भावनोच्यते । सा च कर्तारं विनानुपपन्नेति तमाक्षिपति । यहां यह पूर्वपक्ष होता है कि 'पशुना यजेत' यहांपर संख्या भावना या यागकी अंग नहीं हो सकती है क्योंकि संख्या गुण है इसलिए अमूर्त हुई और अमूर्तरूपादि कहीं अंग नहीं देखा गया है । मूर्तव्रीहि आदि द्रव्य ही अंग होता है । इसका उत्तर करते हैं कि कर्तामें अन्वय द्वारा संख्या भावना या यागकी अंग हो सकती है । पुनः शंका होती है कि संख्याको आख्यातार्थ कर्ताकी ही अङ्ग मानना उचित है आख्यातका अर्थ कर्ता ही है भावना नहीं है क्योंकि कर्ताके व्यापारको ही भावना कहते हैं । और धातुसे ही कर्ताके व्यापारका लाभ हो सकता है । इसमें वैयाकरण शिरोभूषण भट्टोजीदीक्षितका वचन भी है—"फलव्यापार- योर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः" इसका अर्थ कौण्डभट्टने अपने वैयाकरणभूषणसारमें इस तरह किया है कि विक्कित्त्यादि रूप फल ( सीझना ) और भावना रूप व्यापार ये दोनों धातुके अर्थ हैं व्यापाराश्रय ( कर्ता ) और फलाश्रय ( कर्म ) ये दोनों तिङ् ( आख्यात ) के अर्थ हैं । कर्ताको आख्यातका अर्थ होनेमें कोई प्रमाण नहीं है यह कहना केवल साहस मात्र है क्योंकि "लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः" इस पाणिनीय सूत्रसे बढ़कर और कौन प्रमाण होगा । इस सूत्रमें 'कर्तरि कृत्' इस सूत्रसे कर्तरिपदका अपकर्ष होता है । इसलिये इस सूत्रका अर्थ होता है कि अकर्मक धातुसे कर्ता और भावमें एवं सकर्मक धातुसे कर्म और कर्तामें ल प्रत्यय हो । जिस प्रत्ययका जिस अर्थमें विधान किया जाता है उस प्रत्ययका वही अर्थ होता है । स्थानीके अर्थको कहनेमें जो समर्थ हो उसीको आदेश कहते हैं । अतः ल के स्थानमें आख्यात आया है इस- लिये आख्यातार्थ कर्ता ही है । अतः संख्या एकाभिधानश्रुतिसे कर्ताकी ही अंग है यह सिद्ध हुआ । इसका उत्तर कहते हैं कि भावना ही आख्यातार्थ है । कर्ता आख्यातार्थ नहीं है, वह तो आक्षेपलभ्य होता है । आक्षेप शब्दका अर्थ है अनुमान या अर्थापत्ति । इसलिये कर्ताका अनुमान अथवा अर्थापत्तिसे लाभ होगा । “भावना क्वचिदाश्रिता व्यापारविशेषत्वात्” इस अनुमानद्वारा भावनामें क्वचिदाश्रितत्व सिद्ध होनेसे भावना कर्ता ही में आश्रित हो सकती है । अतः कर्ताका लाभ हो गया । एवं जिसके बिना जो अनुपपन्न ( असम्भव ) हो उससे उसका