भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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दीपिकाटीकासहितः। २३ आक्षेप होता है। जैसे देवदत्त स्थूल है किन्तु दिनमें भोजन नहीं करता इस वाक्यसे भोजनके विना स्थूल नहीं हो सकता और दिनमें भोजन नहीं करता है अतः रात्रि भोजनका आक्षेप होता है। इसी तरह प्रकृतमें कर्ताके विना भावना नहीं रह सकती अतः भावनासे कर्ताका आक्षेप होगा। भावनासे किसी अचेतनका आक्षेप करेंगे ऐसी शंका नहीं हो सकती है क्योंकि कृतिरूप भावना अचेतनमें नहीं रह सकती है अतः उससे अचेतनका आक्षेप नहीं होगा। शब्दसे उपस्थित संख्याका शब्दसे अनुपस्थित कर्तामें अन्वय कैसे होगा यह भी सन्देह नहीं कर सकते हैं क्योंकि आख्यात को कर्तामें लक्षणा करते हैं इसलिये कर्ताकी भी उपस्थिति शब्द से ही होती है। कर्ताको ही आख्यातार्थ मानिये और भावनाका आक्षेप सेही बोध होगा ऐसा नहीं कह सकते हैं क्योंकि कर्ताका कृतिमान् अर्थ है और 'आकृत्यधिकरण' न्यायसे जैसे घटादिशब्दका घटत्वादि जाति अर्थ मानते हैं और व्यक्तिका आक्षेप करते हैं। वैसे ही भावनारूप कृतिमें ही आख्यातकी शक्ति है क्योंकि कर्तामें आख्यातकी शक्ति माननेसे शक्यतावच्छेदक (धर्म) कर्तृत्व स्वरूप कृति अनेक हैं अतः शक्यतावच्छे- दकमें गौरव होगा। परन्तु कृतिमें शक्ति माननेसे शक्यतावच्छेदक कृतित्व होगा और कृतित्व तो जाति होनेसे एक है इसलिये शक्यतावच्छेदकमें लाघव होगा। अतः भावना ही आख्यातार्थ है। भावनाको आख्यातार्थ माननेपर 'लः कर्मणि' इस सूत्रसे विरोध नहीं हो सकता है क्योंकि इस सूत्रमें कर्तृ कर्म पदका भावप्रधाननिर्देश (जाति शक्ति) से कर्तृत्व और कर्मत्व ही अर्थ होगा। और 'द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने, बहुषु बहुवचनम्' इन सूत्रोंके साथ एकवाक्यतासे 'लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः' इस सूत्रका एक कर्ता रहे तो एकवचनात्मक लकार हो और दो कर्ता रहे तो द्विवचना- त्मक लकार हो इत्यादि अर्थ होता है। आख्यातार्थ भावना माननेसे "देवदत्तेन पचति" इत्यादि प्रयोग होने लगेगा क्योंकि तिङ्, कृत्, तद्धित और समाससे कर्ता अनुक्त रहने पर तृतीया होती है इसलिये प्रकृतमें भी आख्यातसे कर्ता अनुक्त रहनेसे तृतीया ही होगी ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये क्योंकि कर्तृवृत्ति संख्या अनुक्त हो तो तृतीया हो यही 'कर्तृकरणयोस्तृतीया' इस सूत्रका अर्थ है। प्रकृतमें देवदत्तगत एकत्व संख्या तिङ्से उक्त है इसलिये देवदत्त शब्दसे तृतीया नहीं होगी। 'कर्तरि कृत्' इस सूत्रमें कर्तृपदका कर्ता ही अर्थ है इसलिये कृत् प्रत्ययका कर्ता ही अर्थ होगा अतः 'पाचको देवदत्तः' इत्यादि प्रयोगमें समानविभक्तित्व की सिद्धि हुई। यद्यपि 'कर्तरि कृत्' इसी सूत्रसे कर्तृपदका अपकर्ष 'लः कर्मणि' सूत्रमें होता है तथापि