अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दाधिकार मानकर पूर्व सूत्रमें कर्तृत्व और उत्तरसूत्रमें कर्ता अर्थ करेंगे । अर्थाधिकारमें ही यह नियम है कि दोनों सूत्रोंमें अनुवृत्तिसूचकपदका समान अर्थ हो । अत एव 'अर्थवदधातु'—और 'कृत्तद्धितसमासाश्च' इन दोनों सूत्रोंमें विभिन्न अर्थ- वत्त्वको वैयाकरण मानते हैं । अतः यह सिद्धान्त हुआ कि धातुका अर्थ फल मात्र है और आख्यातका अर्थ भावना ही है । सेयं श्रुतिर्लिङ्गादिभ्यः प्रबला । लिङ्गादिषु न प्रत्यक्षो विनियोजकः शब्दोऽस्ति किन्तु कल्प्यः । यावच्च तैर्विनियोजकशब्दः कल्प्यते तावत्प्र- त्यक्षया श्रुत्या विनियोगस्य कृतत्वेन तेषां कल्पकत्वशक्तेर्व्याहतत्वात् । अत एवैन्द्र्या लिङ्गान्नेन्द्रोपस्थानार्थत्वम् । किन्तु 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपति- ष्ठत' इत्यत्र गार्हपत्यमिति द्वितीयाश्रुत्या गार्हपत्योपस्थानार्थत्वम् । यह श्रुति लिङ्गादिसे बलवती है क्योंकि लिङ्गादिमें (विनियोजक शब्द) अंगके साथ प्रधानका सम्बन्ध बोधकशब्द साक्षात् श्रुत नहीं रहता है किन्तु अर्थप्र- काशसामर्थ्यरूप लिंगसे कल्पित होता है । चूंकि लिंगादिसे विनियोजकशब्द की कल्पना की जाती है इसलिये प्रत्यक्ष श्रुतिसे विनियोग (अंगके साथ प्रधानका संबन्ध बोध) हो जायगा अतः लिंगादिकी कल्पकत्व शक्ति । (विनियोजकशब्द कल्पनाद्वारा विनियोगसामर्थ्य) का नाश हो जाता है । लिंगसे जब श्रुति प्रबल होगी तभी लिंगापेक्षया दुर्बल प्रकरणादिसे भी श्रुति प्रबल हो सकती है अतः लिंगसे श्रुतिप्राबल्य का उदाहरण देते हैं 'नेन्द्र सश्चसि' इस इन्द्र प्रकाशन सामर्थ्य रूप लिंगसे ऐन्द्री ऋचा इन्द्रोपस्थानकी अंग नहीं होती है किन्तु 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इस ऐन्द्री ऋचा से गार्हपत्यरूप अग्नि विशेष की उपस्थिति होने पर 'गार्हपत्यम्' इस द्वितीयाश्रुतिसे यह मन्त्र गार्हपत्योप- स्थान (स्थिति) का अंग होता है । उसका यह अभिप्राय है कि 'ऐन्द्रया गार्हप- त्यमुपतिष्ठते' यह श्रुति है । वहां 'कदाच नस्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' यह मन्त्र ऐन्द्र है क्योंकि इसमें इन्द्रका प्रकाशन है । इस मन्त्रका यह अर्थ है कि हे इन्द्र किसी समय में भी तू (न सश्चसि) नाश करने वाला नहीं होता है किन्तु (दाशुषे) याग करने वालोंके लिये (नस्तरीरसि) प्रसन्न रहता है । यहां पर इन्द्र प्रकाशन (बोधन) सामर्थ्यरूप लिंगसे यह मन्त्र इन्द्र विषयक क्रियाके अंगका बोधक होता है क्योंकि यदि इस मन्त्रसे इन्द्रका उपस्थान नहीं हो तो इस मन्त्रसे इन्द्र प्रकाशन व्यर्थ हो जायगा । इस लिये लिंग द्वारा विनियोगसे इस मन्त्रसे जो क्रिया होगी उसके