भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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प्रति इन्द्र प्रधान है ऐसी बुद्धि होगी । इस मन्त्रसे कौन क्रिया होगी ऐसी आकांक्षा होनेपर 'ऐन्द्र्योपतिष्ठते' इस वाक्यसे उपस्थान क्रियाका बोध होगा । तब 'ऐन्द्र मन्त्रसे इन्द्रका उपस्थान हो' ऐसा अर्थ फलित होगा । एवं 'गार्हप- त्यम्' इस द्वितीयाश्रुतिसे अप्रधानीभूत किञ्चित्करणक क्रियाके प्रति गार्हपत्यनामक अग्निविशेषका प्रधान रूपसे बोध होगा । बादमें 'ऐन्द्र्योपतिष्ठते' इन दोनों पदों मे ऐन्द्रमन्त्र और उपस्थान क्रिया विशेषका बोध होगा तब 'ऐन्द्रमन्त्रसे गार्हपत्यका उपस्थान हो' ऐसा अर्थ होगा । लेकिन लिंगसे श्रुति प्रबल है अतः श्रुतिसे गार्हपत्यका ही उपस्थान होगा । यद्यपि जैसे 'व्रीहिभिर्यजेत, यवैर्वा यजेत' इन दोनोंमें विरोध होनेसे विकल्प होता है इसी तरह श्रुति और लिंग दोनोंमें विकल्प होना चाहिए अथवा लिंगसे इन्द्रमें प्राधान्यका बोध होता है और श्रुतिसे गार्ह- पत्यमें प्राधान्यका बोध होता है । दोनोंके प्रति उपस्थान गुण है इसलिये 'प्रति प्रधानं गुणावृत्तिः' इस न्यायसे उपस्थानकी आवृत्तिसे श्रुति और लिंग दोनोंका समुच्चय होना चाहिए । अथवा वस्तुसामर्थ्यानुसारसे ही श्रुति विनियोग करती है जिसमें जो सामर्थ्य नहीं है उसका भी यदि विनियोग करे तो अग्निमें सेचन करणत्व और जलमें दहन करणत्व रूप सामर्थ्य न रहने पर भी 'अग्निना सिञ्चेत् , जलेन दहेत्' ऐसा भी विनियोग होगा । अतः वस्तुसामर्थ्यरूप लिंग श्रुतिका उपजीव्य ( जिलानेवाला ) है इसलिये श्रुतिसे लिंगको ही प्रबल होना चाहिए । तथापि मुख्य इन्द्रके समान गार्हपत्य अग्निमें भी याग साधनत्व है क्योंकि 'सिंहो माण- वकः' इसके समान आरोपित इन्द्रत्व गार्हपत्यमें भी है अतः ऐन्द्र मन्त्रमें मुख्य इन्द्रके समान ही गार्हपत्यप्रकाशन सामर्थ्य है इसलिये सामर्थ्याभावरूप प्रतिबन्धक नहीं रहनेसे द्वितीया श्रुतिसे शीघ्र ही गार्हपत्यका विनियोग होगा अर्थात् ऐन्द्रमन्त्र गार्हपत्य अग्निके उपस्थानका ही अंग है इन्द्र प्रकाशन सामर्थ्यरूप लिंग तो चिरविलम्बसे विनियोग करेगा । क्योंकि सर्व प्रथम मन्त्रपदसे स्ववाच्यार्थका बोध होगा उसके बाद मन्त्रमें वस्तुप्रकाशन सामर्थ्यका निश्चय होगा उसके बाद वस्तु प्रकाशन सामर्थ्यसे साधनत्ववाची और प्रधानत्ववाची शब्दकी कल्पना होगी उसके बाद कल्पित शब्दसे 'ऐन्द्र मन्त्रसे इन्द्रका उपस्थान हो' ऐसा विनियोग होगा क्योंकि मन्त्रपदके अर्थप्रतिपादन और विनियोगके बीचमें सामर्थ्यनिश्चय और शब्द कल्पना रूप दो व्यापार व्यवधान हैं अतः विलम्बसे विनियोग होना स्वाभाविक है । श्रुति विनियोग पक्षमें तो मन्त्रपदों का अर्थ ज्ञान