भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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२६ अर्थसंग्रहः— होनेसे ही विनियोग होता है उसमें मध्यवर्ती व्यापार कल्पनाकी आवश्यकता नहीं है अतः लिंगसे श्रुति प्रबल है इसलिये श्रुतिसे ही लिंगका बाध होगा। श्रुतिके विनियोग समयमें लिंग प्राप्त नहीं है अतः बाध कैसे होगा ऐसा भ्रममें नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि यहांपर अप्राप्तिरूप ही बाध पदार्थ है। लिङ्गनिर्वचनम्। शब्दसामर्थ्यं लिङ्गम्। यथाहुः—'सामर्थ्यं सर्वशब्दानां लिङ्गमिस्य- भिधीयते' इति। सामर्थ्यं रूढिरेव। तेन समाख्यातोऽस्या भेदः। यौगिक- शब्द्समाख्यातो रूढ्यात्मकलिङ्गशब्दस्य भिन्नत्वात्। तेन 'बर्हिर्देवसदनं दामी'ति मन्त्रस्य कुशलवनाङ्गत्वं न तूलपादिलवनाङ्गत्वम्। तस्य बर्हिर्दा- मीति लिङ्गात्तल्लवनं प्रकाशयितुं समर्थत्वात्। लिंगका लक्षण करते हैं—शब्द सामर्थ्यको ही लिंग कहते हैं। सामर्थ्य- मात्र कहनेसे बीजमें जो अंक