अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
दीपिकाटीकासहितः । १९ विधेः श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि । एतस्य विधेः सहकारिभूतानि षट्प्रमाणानि—श्रुति-लिङ्ग-वाक्य- प्रकरण-स्थान-समाख्यारूपाणि । एतत्सहकृतेनानेन विधिनाङ्गत्त्वं परो- देशप्रवृत्तकृतिसाध्यत्वरूपं पारार्थ्यापरपर्यायं ज्ञाप्यते । विनियोगविधिके सहकारी छै प्रमाण हैं। जैसे-श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या । इसके (सहकृत) साथ होकर निवियोग विधि अंगत्वको समझाती है । ( परोद्देश प्रवृत्त ) स्वर्गादि फलके उद्देश्यसे स्वर्गादिकारणीभूतयागादिमें प्रवृत्त पुरुषका ( कृतिसाध्य ) यत्नव्याप्य जो हो उसीको अंग कहते हैं । जैसे स्वर्गादि फलके लिये दर्शादियागमें प्रवृत्त पुरुषका यत्नव्याप्य ( साध्य ) प्रयाजादि हैं इसलिये प्रयाजादि उस ( दर्श ) का अङ्ग है अंगत्वका ही पर्याय पारार्थ्य है । तत्र निरपेक्षो रवः श्रुतिः । सा च त्रिविधा—विधात्री, अभिधात्री, विनियोक्त्री च । तत्राद्या लिङाद्यात्मिका । द्वितीया व्रीह्यादिश्रुतिः । यस्य च शब्दस्य श्रवणादेव संबन्धः प्रतीयते सा विनियोक्त्री । श्रुतिका लक्षण करते हैं—प्रमाणान्तरकी जो अपेक्षा नहीं रखे ऐसे रव ( शब्द ) को श्रुति कहते हैं । रवमात्रको श्रुति कहनेसे घटादि शब्दमें अतिव्याप्ति होगी अतः निरपेक्ष कहा । घटादि शब्द तो प्रमाणान्तर सापेक्ष है । इस श्रुतिके तीन भेद हैं । विधात्री ( विधान करनेवाली ) अभिधात्री ( अभिधान करनेवाली ) और विनियोक्त्री ( विनियोग करनेवाली ) । उनमें लिङा- दिको विधात्री कहते हैं । व्रीह्यादि शब्दको अभिधात्री कहते हैं । और जिस शब्दके श्रवणमात्रसे ही सम्बन्ध ज्ञान हो उसे विनियोक्त्री कहते हैं । विनियोक्त्री श्रुतिस्त्रिधा । सापि त्रिविधा—विभक्तिरूपा, एकाभिधानरूपा, एकपदरूपा चेति । तत्र विभक्तिश्रुत्या अङ्गत्त्वं यथा ‘व्रीहिभिर्यजेते’ति तृतीयाश्रुत्या व्रीहीणां यागाङ्गत्त्वम् । तदपि पुरोडाशप्रकृतितया । यथा पशोर्हृदयादिरूपहविः- प्रकृतितया यागाङ्गत्त्वम् । विनियोक्त्री श्रुति भी तीन प्रकार की है । जैसे विभक्तिरूपा, एकाभिधानरूपा और एकपदरूपा । उनमें विभक्ति श्रुतिसे जो अंग होता है उसका उदाहरण देते हैं । जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत’ यहां तृतीया श्रुतिसे व्रीहि यागका अङ्ग होता है। व्रीहिसे पुरोडाश ( हविर्विशेष ) बनता है और पुरोडाश यागका अङ्ग है इसलिये व्रीहि भी यागका
२८ अर्थसंग्रहः— अंग होता है। पुरोडाशकी प्रकृति होनेसे व्रीहिके यागांग होनेमें दृष्टान्त बतलाते हैं— जैसे यागका अंगभूत पशुहृदयादि रूप हविष्की प्रकृति होनेसे ही पशु अङ्ग होता है। वह साक्षात् यागका अंग नहीं है किन्तु 'अथ हृदयस्याग्रेऽवद्यत्यथ वक्षसः' इस शास्त्रसे हृदयादिरूप अवयव ही साक्षात् अंग है। इसी तरह साक्षात् अंग पुरोडाश है और उसके द्वारा व्रीहि भी यागांग होता है। तृतीयाविभक्तिरूपाया उदाहरणम्। 'अरुणया एकहायन्या गवा सोमं क्रीणाति' त्यस्मिन् वाक्ये आरुण्य- स्यापि तृतीयाश्रुत्या क्रयाङ्गत्वम्। तदपि गोरूपद्रव्यपरिच्छेदद्वारा न तु साक्षात्, अमूर्तत्वात्। 'अरुणया' इस वाक्यमें तृतीया श्रुतिसे (आरुण्य) रक्तवर्ण भी सोम क्रयणका अंग होता है। आरुण्य अमूर्त (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मनको मूर्त कहते हैं इससे भिन्न) है इससे क्रयण नहीं हो सकता इसलिये वह साक्षात् अङ्ग नहीं हो सकता है किन्तु क्रयणका साक्षात् हेतुभूत गोरूपद्रव्यपरिच्छेद (दूसरेकी व्यावृत्तिकर द्रव्यका निश्चय) द्वारा अङ्ग होता है। यहां पर यह अभिप्राय है कि कारकका क्रियामें ही अन्वय होता है इस नियमसे आरुण्यमें तृतीयाका श्रवण होनेके कारण पहले क्रयण क्रियामें ही साक्षात् अन्वय होगा परन्तु आरुण्य गुणसे क्रयण बाधित है इसलिए पश्चात् गोरूप द्रव्यमें अन्वय होगा। द्वितीयारूपाया विनियोक्त्र्या उदाहरणम्। 'व्रीहीन्प्रोक्षती'ति प्रोक्षणस्य व्रीह्यङ्गत्वं द्वितीयाश्रुत्या। तच्च प्रोक्षणं न व्रीहिस्वरूपार्थम्, तस्य तेन विनाप्युपपत्तेः। किन्त्वपूर्वसाधनत्वप्रयुक्तम्। व्रीहीनप्रोक्ष्य यागानुष्ठानेऽपूर्वानुपपत्तेः। एवं सर्वेष्वङ्गेष्वपूर्वप्रयुक्तमङ्गत्वं बोध्यम्। 'व्रीहीन्प्रोक्षति' यहां पर द्वितीया श्रुतिसे प्रोक्षण व्रीहिका अङ्ग होता है। व्रीहिका अङ्गभूत प्रोक्षण व्रीहिस्वरूपार्थ नहीं है क्योंकि प्रोक्षणके विना भी व्रीहिका स्वरूप पहलेसे ही निष्पन्न है। किन्तु प्रोक्षणसे अपूर्वकी उत्पत्ति होती है अतः प्रोक्षण अपूर्वका कारण होनेसे व्रीहिका अङ्ग होता है। जैसे अनुपनीत ब्राह्मण बालकके द्वारा किया गया वेदाध्ययनसे अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती इसी तरह व्रीहि प्रोक्षणके विना यागानुष्ठानसे अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती है। इसी तरह अवघातादि सभीको अपूर्व प्रयुक्त ही अङ्ग समझना चाहिए।
दीपिकाटीकासहितः। २९ द्वितीयाविनियोक्त्र्या उदाहरणम् । एवम् 'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्त' इत्यत्र द्विती- याश्रुत्या मन्त्रस्याश्वाभिधान्यङ्गत्वम् । 'इमामगृभ्णन्' इस मन्त्र का यह अर्थ है कि (ऋतस्य) सत्य फलसम्बन्धि (इमां रशनां) बन्धनरज्जुको (अगृभ्णन्) ग्रहण किया । इस वाक्यमें (अश्वा- भिधानीम्) इस द्वितीया श्रुतिसे यह मन्त्र अश्वाभिधानी (अश्ववन्धनरस्सी) का अङ्ग होता है । सप्तमीविभक्तिविनियोक्त्र्या उदाहरणम् । 'यदाहवनीये जुहोति' त्याहवनीयस्य होमाङ्गत्वं सप्तमीश्रुत्या । एव- मन्याऽपि विभक्तिश्रुत्या विनियोगो ज्ञेयः । "यदाहवनीये जुहोति" यहां पर सप्तमी श्रुतिसे आहवनीय (अग्नि विशेष को होमका अंग समझना चाहिये । उससे 'आहवनीय अग्निमें होम करता है' यह बोध होता है, इसी तरह विभक्ति श्रुतिसे दूसरेको भी विनियोग (अंग) जानना चाहिये । जैसे 'दध्ना जुहोति, पयसा जुहोति' इत्यादिमें तृतीया श्रुतिसे दधि और दूध प्रभृति, होमका अंग होता है । 'पशुना यजेते' त्यत्रैकत्वपुंस्त्वयोः समानाभिधानश्रुत्या कारकाङ्गत्वम् । यजेतेत्याख्याताभिहितसंख्याया भावनाङ्गत्वं समानाभिधानश्रुतेरेव पद- श्रुत्या च यागाङ्गत्वम् । एकाभिधानरूप और एकपदरूप विनियोक्त्रीका उदाहरण देते हैं । 'पशुना- यजेत' यहांपर (टा) प्रत्ययके ही करणरूपकारक, पुंस्त्व और एकत्वसंख्या ये तीन अर्थ हैं इसलिये टारूप एकाभिधान (एकवाचक) श्रुतिसे एकत्व और पुंस्त्व ये दोनों करणरूप कारकके अंग होते हैं और 'पशुना' इस एकपदश्रुतिसे पशुरूप द्रव्यके अंग होते हैं । इसी तरह 'यजेत' यहांपर आख्यात (तङ्) के ही भावना और एकत्व संख्या अर्थ हैं । इसलिये (तरूप) एकाभिधानश्रुतिसे एकत्वसंख्या भावना- की अंग होती है और (यजेत) इस एक पदश्रुतिसे संख्या यागकी अंग होती है । अमूर्ताया अपि भावनाङ्गत्वम् । न चामूर्तायास्तस्याः कथं भावनाङ्गत्वमिति वाच्यम् । कर्तृपरिच्छेद- द्वारा तदुपपत्तेः । कर्ता चाक्षेपालभ्यः ।
३२ | अर्थसंग्रहः— | भावनाया आख्यातवाच्यत्वम् । आख्यातेन हि भावनोच्यते । सा च कर्तारं विनानुपपन्नेति तमाक्षिपति । यहां यह पूर्वपक्ष होता है कि 'पशुना यजेत' यहांपर संख्या भावना या यागकी अंग नहीं हो सकती है क्योंकि संख्या गुण है इसलिए अमूर्त हुई और अमूर्तरूपादि कहीं अंग नहीं देखा गया है । मूर्तव्रीहि आदि द्रव्य ही अंग होता है । इसका उत्तर करते हैं कि कर्तामें अन्वय द्वारा संख्या भावना या यागकी अंग हो सकती है । पुनः शंका होती है कि संख्याको आख्यातार्थ कर्ताकी ही अङ्ग मानना उचित है आख्यातका अर्थ कर्ता ही है भावना नहीं है क्योंकि कर्ताके व्यापारको ही भावना कहते हैं । और धातुसे ही कर्ताके व्यापारका लाभ हो सकता है । इसमें वैयाकरण शिरोभूषण भट्टोजीदीक्षितका वचन भी है—"फलव्यापार- योर्धातुराश्रये तु तिङः स्मृताः" इसका अर्थ कौण्डभट्टने अपने वैयाकरणभूषणसारमें इस तरह किया है कि विक्कित्त्यादि रूप फल ( सीझना ) और भावना रूप व्यापार ये दोनों धातुके अर्थ हैं व्यापाराश्रय ( कर्ता ) और फलाश्रय ( कर्म ) ये दोनों तिङ् ( आख्यात ) के अर्थ हैं । कर्ताको आख्यातका अर्थ होनेमें कोई प्रमाण नहीं है यह कहना केवल साहस मात्र है क्योंकि "लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः" इस पाणिनीय सूत्रसे बढ़कर और कौन प्रमाण होगा । इस सूत्रमें 'कर्तरि कृत्' इस सूत्रसे कर्तरिपदका अपकर्ष होता है । इसलिये इस सूत्रका अर्थ होता है कि अकर्मक धातुसे कर्ता और भावमें एवं सकर्मक धातुसे कर्म और कर्तामें ल प्रत्यय हो । जिस प्रत्ययका जिस अर्थमें विधान किया जाता है उस प्रत्ययका वही अर्थ होता है । स्थानीके अर्थको कहनेमें जो समर्थ हो उसीको आदेश कहते हैं । अतः ल के स्थानमें आख्यात आया है इस- लिये आख्यातार्थ कर्ता ही है । अतः संख्या एकाभिधानश्रुतिसे कर्ताकी ही अंग है यह सिद्ध हुआ । इसका उत्तर कहते हैं कि भावना ही आख्यातार्थ है । कर्ता आख्यातार्थ नहीं है, वह तो आक्षेपलभ्य होता है । आक्षेप शब्दका अर्थ है अनुमान या अर्थापत्ति । इसलिये कर्ताका अनुमान अथवा अर्थापत्तिसे लाभ होगा । “भावना क्वचिदाश्रिता व्यापारविशेषत्वात्” इस अनुमानद्वारा भावनामें क्वचिदाश्रितत्व सिद्ध होनेसे भावना कर्ता ही में आश्रित हो सकती है । अतः कर्ताका लाभ हो गया । एवं जिसके बिना जो अनुपपन्न ( असम्भव ) हो उससे उसका
दीपिकाटीकासहितः। २३ आक्षेप होता है। जैसे देवदत्त स्थूल है किन्तु दिनमें भोजन नहीं करता इस वाक्यसे भोजनके विना स्थूल नहीं हो सकता और दिनमें भोजन नहीं करता है अतः रात्रि भोजनका आक्षेप होता है। इसी तरह प्रकृतमें कर्ताके विना भावना नहीं रह सकती अतः भावनासे कर्ताका आक्षेप होगा। भावनासे किसी अचेतनका आक्षेप करेंगे ऐसी शंका नहीं हो सकती है क्योंकि कृतिरूप भावना अचेतनमें नहीं रह सकती है अतः उससे अचेतनका आक्षेप नहीं होगा। शब्दसे उपस्थित संख्याका शब्दसे अनुपस्थित कर्तामें अन्वय कैसे होगा यह भी सन्देह नहीं कर सकते हैं क्योंकि आख्यात को कर्तामें लक्षणा करते हैं इसलिये कर्ताकी भी उपस्थिति शब्द से ही होती है। कर्ताको ही आख्यातार्थ मानिये और भावनाका आक्षेप सेही बोध होगा ऐसा नहीं कह सकते हैं क्योंकि कर्ताका कृतिमान् अर्थ है और 'आकृत्यधिकरण' न्यायसे जैसे घटादिशब्दका घटत्वादि जाति अर्थ मानते हैं और व्यक्तिका आक्षेप करते हैं। वैसे ही भावनारूप कृतिमें ही आख्यातकी शक्ति है क्योंकि कर्तामें आख्यातकी शक्ति माननेसे शक्यतावच्छेदक (धर्म) कर्तृत्व स्वरूप कृति अनेक हैं अतः शक्यतावच्छे- दकमें गौरव होगा। परन्तु कृतिमें शक्ति माननेसे शक्यतावच्छेदक कृतित्व होगा और कृतित्व तो जाति होनेसे एक है इसलिये शक्यतावच्छेदकमें लाघव होगा। अतः भावना ही आख्यातार्थ है। भावनाको आख्यातार्थ माननेपर 'लः कर्मणि' इस सूत्रसे विरोध नहीं हो सकता है क्योंकि इस सूत्रमें कर्तृ कर्म पदका भावप्रधाननिर्देश (जाति शक्ति) से कर्तृत्व और कर्मत्व ही अर्थ होगा। और 'द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने, बहुषु बहुवचनम्' इन सूत्रोंके साथ एकवाक्यतासे 'लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः' इस सूत्रका एक कर्ता रहे तो एकवचनात्मक लकार हो और दो कर्ता रहे तो द्विवचना- त्मक लकार हो इत्यादि अर्थ होता है। आख्यातार्थ भावना माननेसे "देवदत्तेन पचति" इत्यादि प्रयोग होने लगेगा क्योंकि तिङ्, कृत्, तद्धित और समाससे कर्ता अनुक्त रहने पर तृतीया होती है इसलिये प्रकृतमें भी आख्यातसे कर्ता अनुक्त रहनेसे तृतीया ही होगी ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये क्योंकि कर्तृवृत्ति संख्या अनुक्त हो तो तृतीया हो यही 'कर्तृकरणयोस्तृतीया' इस सूत्रका अर्थ है। प्रकृतमें देवदत्तगत एकत्व संख्या तिङ्से उक्त है इसलिये देवदत्त शब्दसे तृतीया नहीं होगी। 'कर्तरि कृत्' इस सूत्रमें कर्तृपदका कर्ता ही अर्थ है इसलिये कृत् प्रत्ययका कर्ता ही अर्थ होगा अतः 'पाचको देवदत्तः' इत्यादि प्रयोगमें समानविभक्तित्व की सिद्धि हुई। यद्यपि 'कर्तरि कृत्' इसी सूत्रसे कर्तृपदका अपकर्ष 'लः कर्मणि' सूत्रमें होता है तथापि
शब्दाधिकार मानकर पूर्व सूत्रमें कर्तृत्व और उत्तरसूत्रमें कर्ता अर्थ करेंगे । अर्थाधिकारमें ही यह नियम है कि दोनों सूत्रोंमें अनुवृत्तिसूचकपदका समान अर्थ हो । अत एव 'अर्थवदधातु'—और 'कृत्तद्धितसमासाश्च' इन दोनों सूत्रोंमें विभिन्न अर्थ- वत्त्वको वैयाकरण मानते हैं । अतः यह सिद्धान्त हुआ कि धातुका अर्थ फल मात्र है और आख्यातका अर्थ भावना ही है । सेयं श्रुतिर्लिङ्गादिभ्यः प्रबला । लिङ्गादिषु न प्रत्यक्षो विनियोजकः शब्दोऽस्ति किन्तु कल्प्यः । यावच्च तैर्विनियोजकशब्दः कल्प्यते तावत्प्र- त्यक्षया श्रुत्या विनियोगस्य कृतत्वेन तेषां कल्पकत्वशक्तेर्व्याहतत्वात् । अत एवैन्द्र्या लिङ्गान्नेन्द्रोपस्थानार्थत्वम् । किन्तु 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपति- ष्ठत' इत्यत्र गार्हपत्यमिति द्वितीयाश्रुत्या गार्हपत्योपस्थानार्थत्वम् । यह श्रुति लिङ्गादिसे बलवती है क्योंकि लिङ्गादिमें (विनियोजक शब्द) अंगके साथ प्रधानका सम्बन्ध बोधकशब्द साक्षात् श्रुत नहीं रहता है किन्तु अर्थप्र- काशसामर्थ्यरूप लिंगसे कल्पित होता है । चूंकि लिंगादिसे विनियोजकशब्द की कल्पना की जाती है इसलिये प्रत्यक्ष श्रुतिसे विनियोग (अंगके साथ प्रधानका संबन्ध बोध) हो जायगा अतः लिंगादिकी कल्पकत्व शक्ति । (विनियोजकशब्द कल्पनाद्वारा विनियोगसामर्थ्य) का नाश हो जाता है । लिंगसे जब श्रुति प्रबल होगी तभी लिंगापेक्षया दुर्बल प्रकरणादिसे भी श्रुति प्रबल हो सकती है अतः लिंगसे श्रुतिप्राबल्य का उदाहरण देते हैं 'नेन्द्र सश्चसि' इस इन्द्र प्रकाशन सामर्थ्य रूप लिंगसे ऐन्द्री ऋचा इन्द्रोपस्थानकी अंग नहीं होती है किन्तु 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' इस ऐन्द्री ऋचा से गार्हपत्यरूप अग्नि विशेष की उपस्थिति होने पर 'गार्हपत्यम्' इस द्वितीयाश्रुतिसे यह मन्त्र गार्हपत्योप- स्थान (स्थिति) का अंग होता है । उसका यह अभिप्राय है कि 'ऐन्द्रया गार्हप- त्यमुपतिष्ठते' यह श्रुति है । वहां 'कदाच नस्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' यह मन्त्र ऐन्द्र है क्योंकि इसमें इन्द्रका प्रकाशन है । इस मन्त्रका यह अर्थ है कि हे इन्द्र किसी समय में भी तू (न सश्चसि) नाश करने वाला नहीं होता है किन्तु (दाशुषे) याग करने वालोंके लिये (नस्तरीरसि) प्रसन्न रहता है । यहां पर इन्द्र प्रकाशन (बोधन) सामर्थ्यरूप लिंगसे यह मन्त्र इन्द्र विषयक क्रियाके अंगका बोधक होता है क्योंकि यदि इस मन्त्रसे इन्द्रका उपस्थान नहीं हो तो इस मन्त्रसे इन्द्र प्रकाशन व्यर्थ हो जायगा । इस लिये लिंग द्वारा विनियोगसे इस मन्त्रसे जो क्रिया होगी उसके
२. विधि-स्वरूप: उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग एवं अधिकार विधि
प्रति इन्द्र प्रधान है ऐसी बुद्धि होगी । इस मन्त्रसे कौन क्रिया होगी ऐसी आकांक्षा होनेपर 'ऐन्द्र्योपतिष्ठते' इस वाक्यसे उपस्थान क्रियाका बोध होगा । तब 'ऐन्द्र मन्त्रसे इन्द्रका उपस्थान हो' ऐसा अर्थ फलित होगा । एवं 'गार्हप- त्यम्' इस द्वितीयाश्रुतिसे अप्रधानीभूत किञ्चित्करणक क्रियाके प्रति गार्हपत्यनामक अग्निविशेषका प्रधान रूपसे बोध होगा । बादमें 'ऐन्द्र्योपतिष्ठते' इन दोनों पदों मे ऐन्द्रमन्त्र और उपस्थान क्रिया विशेषका बोध होगा तब 'ऐन्द्रमन्त्रसे गार्हपत्यका उपस्थान हो' ऐसा अर्थ होगा । लेकिन लिंगसे श्रुति प्रबल है अतः श्रुतिसे गार्हपत्यका ही उपस्थान होगा । यद्यपि जैसे 'व्रीहिभिर्यजेत, यवैर्वा यजेत' इन दोनोंमें विरोध होनेसे विकल्प होता है इसी तरह श्रुति और लिंग दोनोंमें विकल्प होना चाहिए अथवा लिंगसे इन्द्रमें प्राधान्यका बोध होता है और श्रुतिसे गार्ह- पत्यमें प्राधान्यका बोध होता है । दोनोंके प्रति उपस्थान गुण है इसलिये 'प्रति प्रधानं गुणावृत्तिः' इस न्यायसे उपस्थानकी आवृत्तिसे श्रुति और लिंग दोनोंका समुच्चय होना चाहिए । अथवा वस्तुसामर्थ्यानुसारसे ही श्रुति विनियोग करती है जिसमें जो सामर्थ्य नहीं है उसका भी यदि विनियोग करे तो अग्निमें सेचन करणत्व और जलमें दहन करणत्व रूप सामर्थ्य न रहने पर भी 'अग्निना सिञ्चेत् , जलेन दहेत्' ऐसा भी विनियोग होगा । अतः वस्तुसामर्थ्यरूप लिंग श्रुतिका उपजीव्य ( जिलानेवाला ) है इसलिये श्रुतिसे लिंगको ही प्रबल होना चाहिए । तथापि मुख्य इन्द्रके समान गार्हपत्य अग्निमें भी याग साधनत्व है क्योंकि 'सिंहो माण- वकः' इसके समान आरोपित इन्द्रत्व गार्हपत्यमें भी है अतः ऐन्द्र मन्त्रमें मुख्य इन्द्रके समान ही गार्हपत्यप्रकाशन सामर्थ्य है इसलिये सामर्थ्याभावरूप प्रतिबन्धक नहीं रहनेसे द्वितीया श्रुतिसे शीघ्र ही गार्हपत्यका विनियोग होगा अर्थात् ऐन्द्रमन्त्र गार्हपत्य अग्निके उपस्थानका ही अंग है इन्द्र प्रकाशन सामर्थ्यरूप लिंग तो चिरविलम्बसे विनियोग करेगा । क्योंकि सर्व प्रथम मन्त्रपदसे स्ववाच्यार्थका बोध होगा उसके बाद मन्त्रमें वस्तुप्रकाशन सामर्थ्यका निश्चय होगा उसके बाद वस्तु प्रकाशन सामर्थ्यसे साधनत्ववाची और प्रधानत्ववाची शब्दकी कल्पना होगी उसके बाद कल्पित शब्दसे 'ऐन्द्र मन्त्रसे इन्द्रका उपस्थान हो' ऐसा विनियोग होगा क्योंकि मन्त्रपदके अर्थप्रतिपादन और विनियोगके बीचमें सामर्थ्यनिश्चय और शब्द कल्पना रूप दो व्यापार व्यवधान हैं अतः विलम्बसे विनियोग होना स्वाभाविक है । श्रुति विनियोग पक्षमें तो मन्त्रपदों का अर्थ ज्ञान
२६ अर्थसंग्रहः— होनेसे ही विनियोग होता है उसमें मध्यवर्ती व्यापार कल्पनाकी आवश्यकता नहीं है अतः लिंगसे श्रुति प्रबल है इसलिये श्रुतिसे ही लिंगका बाध होगा। श्रुतिके विनियोग समयमें लिंग प्राप्त नहीं है अतः बाध कैसे होगा ऐसा भ्रममें नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि यहांपर अप्राप्तिरूप ही बाध पदार्थ है। लिङ्गनिर्वचनम्। शब्दसामर्थ्यं लिङ्गम्। यथाहुः—'सामर्थ्यं सर्वशब्दानां लिङ्गमिस्य- भिधीयते' इति। सामर्थ्यं रूढिरेव। तेन समाख्यातोऽस्या भेदः। यौगिक- शब्द्समाख्यातो रूढ्यात्मकलिङ्गशब्दस्य भिन्नत्वात्। तेन 'बर्हिर्देवसदनं दामी'ति मन्त्रस्य कुशलवनाङ्गत्वं न तूलपादिलवनाङ्गत्वम्। तस्य बर्हिर्दा- मीति लिङ्गात्तल्लवनं प्रकाशयितुं समर्थत्वात्। लिंगका लक्षण करते हैं—शब्द सामर्थ्यको ही लिंग कहते हैं। सामर्थ्य- मात्र कहनेसे बीजमें जो अंक
दीपिकाटीकासहितः। २७ जुष्टं निर्वपामि' इसमन्त्रका निर्वाप ( त्याग ) प्रकाशन सामर्थ्यरूप लिंगसे निर्वापमें विनियोग होता है क्योंकि जिस मन्त्रमें जिस अर्थ का प्रकाशन सामर्थ्य है वह उसका अङ्ग होता है। यहां पर यह जानने योग्य बात है कि लिंग के दो भेद हैं—संबन्ध सामान्य बोधक प्रमाणान्तरनिरपेक्ष और सम्बन्धसामान्य बोधक- प्रमाणान्तरसापेक्ष । उनमें जिसके बिना जो असम्भव हो वह सम्बन्ध सामान्य बोधक प्रमाणान्तरकी अपेक्षा रहित केवल लिंगसे उसका अंग होता है। जैसे अर्थ ज्ञानके बिना कर्मानुष्ठान असम्भव है इसलिये अर्थज्ञान कर्मानुष्ठानका अंग केवल लिंगसे होता है। जिसके बिना भी जो होसके वह सम्बन्ध सामान्य बोधक प्रमाणान्तरसापेक्ष लिंगसे उसका अंग होता है। जैसे 'अग्नये जुष्टं निर्वपामि' यह मन्त्र निर्वापका अङ्ग है क्योंकि इस मंत्रके बिना भी उपायान्तरसे स्मरणकर निर्वाप हो सकता है। अतः यह मन्त्र निर्वापस्वरूप बोधक नहीं है अपितु अपूर्वके कारणीभूत निर्वाप प्रकाशनार्थ है किन्तु केवल सामर्थ्यरूप लिङ्गसे मन्त्र, अपूर्व कारणीभूत निर्वाप प्रकाशनार्थ नहीं हो सकता है क्योंकि इस मन्त्रमें केवल निर्वापप्रकाशन सामर्थ्य ही है इसलिये सम्बन्ध सामान्य बोधक प्रकरणादि प्रमा- णान्तर को अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा तब दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें इस मन्त्रका पाठ है इसलिये दर्शपूर्णमासके अपूर्व सम्बन्धी कुछ प्रकाशित होता है यह कल्पना करेंगे। दर्शपूर्णमासका अपूर्वसम्बन्धी क्या प्रकाशित होता है ऐसी आकांक्षा होनेपर निर्वापप्रकाशन सामर्थ्यरूप लिंगसे पुरोडाश निर्वापका बोध होता है। अतः 'अग्नये जुष्टं' यह मन्त्र निर्वापका अंग है यह सिद्ध हुआ। यह लिंग वाक्यसे प्रबल है। अतएव ( वाक्यसे लिंगको प्रबल होनेके कारण ) 'स्योनं ते सदनं कृणोमि' यह मन्त्र सदनकरण प्रकाशन सामर्थ्यरूप-'सदनं कृणोमि' इस लिंगसे पुरोडाश सदन करणके प्रति अंग होता है किन्तु 'सदनं कृणोमि' 'तस्मिन् सीद' इस तरह सहोच्चारणरूप वाक्यसे सम्पूर्ण मन्त्र पुरोडाश सदन करणके प्रति और पुरोडाश स्थापनाके प्रति अंग नहीं होता है। उसका यह अभिप्राय है कि 'स्योनं ते सदनं कृणोमि' यहां पर “घृतस्य धारया सुशेवं कल्पयामि तस्मिन् सीदामृते प्रतितिष्ठ, व्रीहीणां मेध, सुमनस्यमान” यह वाक्य शेष है। इसका अर्थ यह है कि हे पुरोडाश ! तुम्हारा (स्योनं) समीचीन (सदनं) स्थान मैंने ( कृणोमि ) किया है उस स्थानको ( घृतस्य धारया ) घृतकी धारासे (सुशेवं) अच्छी तरह सेवनके योग्य करता हूँ। ( व्रीहीणां मेध ) हे धानोंके सारभूत ३ अ० सं०
२८ अर्थसंग्रहः— पुरोडाश । इस ( अमृत ) अच्छे स्थानमें तुम ( सुमनस्यमानः ) समाहित चित्तसे ( सीद ) बैठो और ( प्रतिष्ठ ) स्थिर रहो । यहांपर यह सन्देह उपस्थित होता है कि इस समस्त मन्त्रमें स्थानकरणांगत्व और पुरोडाश स्थापनाङ्गत्व है अथवा “स्योनं ते सदनं कृणोमि” यह स्थानकरणका अंग है और ‘घृतस्य धारया’ इत्यादि मन्त्र पुरोडाश स्थापनका अंग है ऐसा संशय होनेपर पूर्वपक्ष होता है कि यह एक ही मन्त्र है इसलिये सम्पूर्ण मन्त्र ही स्थानकरणका और पुरोडाश स्थापनका अंग है । अर्थात् ( सर्वेणानेन मन्त्रेण स्थानं कर्तव्यम् ) इस समस्त मन्त्रसे स्थान करना चाहिए एवं ( सर्वेण मन्त्रेण पुरोडाशः स्थापनीयः ) समस्त मन्त्रसे पुरोडाश स्थापन करना चाहिये इस तरहसे विनि- योजकश्रुति की कल्पना करनी चाहिये क्योंकि इस मन्त्रमें स्थान करण प्रकाशन सामर्थ्यके समान पुरोडाश स्थापन प्रकाशन सामर्थ्य भी है । अब यहांपर यह सिद्धान्त है कि प्रत्यक्ष लिंगसे पूर्वार्द्ध सदन करणका अंग है और उत्तरार्द्ध पुरोडाश स्थापनका अंग है । क्योंकि पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धमें परस्पर अन्वयसे जो एक- वाक्यता होती है उसीसे समस्त मंत्रमें स्थान करणांगत्व और पुरोडाश स्थाप- नांगत्व ये दोनों हो सकते हैं। और ये भी दोनों पुरोडाश स्थापनमें पूर्वार्द्ध की शक्ति कल्पनाके बिना और सदन करणमें उत्तरार्द्ध की शक्ति कल्पनाके बिना नहीं हो सकते, अतः लिंग की कल्पना करनी होगी । इसलिये श्रुतिके प्रति लिंग कल्पनासे वाक्य व्यवहित हो जाता है और पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धमें जो दोनों प्रत्यक्ष लिंग हैं वे श्रुतिके प्रति व्यवहित नहीं हैं। अतः वाक्यसे लिंग प्रबल हुआ इसलिये लिंग द्वारा पूर्वार्द्धसे सदन करणका और उत्तरार्द्धसे पुरोडाश स्थापनका विनियोगमें कोई प्रतिबन्धक नहीं है । वाक्यनिर्वचनम । समभिव्याहारो वाक्यम् । समभिव्याहारश्च साध्यत्वादिवाचकद्विती- याद्यभावेऽपि । वस्तुतः शेषशेषिवाचकपदयोः सहोच्चारणम् । यथा ‘यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापँ श्लोकं शृणोति’ । अत्र पर्णताजुह्वोः सम- भिव्याहारादेव पर्णताया जुह्वङ्गत्वम् । न चानर्थक्यम् , अन्यथापि जुह्वाः सिद्धत्वादिति वाच्यम् । जुहूशब्देन तत्साध्यापूर्वलक्षणात् । समभिव्याहार को वाक्य कहते हैं । साध्यत्वादिवाचक द्वितीयादि नहीं रहने पर भी समभिव्याहार रहता है । वस्तुतः शेष (अंग) और शेषी (प्रधान) अङ्गी वाचक-
दीपिकाटीकासहितः । [२९] पदोंका एक साथ उच्चारण को समभिव्याहार (वाक्य) कहते हैं । उदाहरण बतलाते हैं जैसे 'पर्णमयी जुहूः' इत्यादि । यहांपर पर्णता ( पलाश ) और जुहूका एक साथ उच्चारण है इसलिये पर्णता जुहूकी अंग होती है । यहां यह शंका उठती है कि दूसरे काष्ठसे भी जुहू ( अर्धचन्द्राकृति यज्ञ पात्र विशेष ) हो सकती है अतः पर्णताका उपादान व्यर्थ है इसका उत्तर देते हैं कि जुहू शब्दको जुहू साध्य अपूर्व में लक्षणा करते हैं । अर्थात् पर्णतासे बनाई गई जुहूसे ही अपूर्वकी उत्पत्ति होती है काष्ठान्तर निर्मित जुहूसे अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती है । तथा च वाक्यार्थः पर्णतायावत्तहविर्धारणद्वारा जुह्वपूर्व भावयेदिति । एवं च पर्णतया यदि जुहूः क्रियते तदैव तत्साध्यमपूर्व भवति नान्यथेति गम्यत इति न पर्णताया वैयर्थ्यम् । अवत्तहविर्धारणद्वारेति चावश्यं वक्तव्यम् । अन्यथा स्रुवादिष्वपि पर्णतापत्तेः, सेयं पर्णता अनारभ्याधी- तापि सर्वप्रकृतिष्वेवान्वेति न विकृतिषु । तत्र चोदकेनापि तत्प्राप्तिसंभवा- त्पौनरुक्त्यापत्तेः । जुहूकी जुहू साध्य अपूर्वमें लक्षणा करने पर जो वाक्यार्थ होता है उसको बतलाते हैं "अवत्त ( खण्डशः कृत्वा गृहीत ) हविर्धारणद्वारा पर्णता (पलाश) निर्मित पात्र विशेषसे जुहूसाध्य अपूर्वकी भावना करे" यह वाक्यका अर्थ होगा । अर्थात् पर्णतानिर्मित जुहूमें खण्डशः कृत चरु आदि हविष लेकर यज्ञ करे । इसलिये जब पर्णतासे जुहू की जायगी तभी जुहू साध्य अपूर्व होगा अन्यथा नहीं यह सिद्ध हुआ अतः पर्णताका वैयर्थ्य नहीं हुआ । अवत्त हविर्धारण द्वारा यह अर्थ करना ही पड़ेगा । अन्यथा स्रुवादि भी आज्य हविर्धारण द्वारा जुहू साध्य अपूर्वका उपकारक होता है अतः उसमें भी पर्णताकी आपत्ति होगी । अर्थात् स्रुवादि भी पलाशका ही बनाना पड़ेगा । इस पर्णताका ( अनारभ्याधीता ) सामान्य विधान होनेपर भी सब प्रकृति यज्ञमें ही अन्वय होगा किन्तु विकृति यज्ञमें अन्वय नहीं होगा । क्योंकि विकृति यज्ञमें 'प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या' ( प्रकृतिके समान विकृति करनी चाहिये ) इस चोदक वाक्यसे ही पर्णताकी प्राप्ति है अतः विकृति यागमें पर्णताका अन्वय करेंगे तो पुनरुक्ति दोष होने लगेगा अतः विकृति यागमें पर्णताका अन्वय नहीं करना चाहिये । प्रकृतिविकृतिलक्षणम् । यत्र समग्राङ्गोपदेशः सा प्रकृतिः, यथा दर्शपूर्णमासादिः । तत्प्रकरणे
३० अर्थसंग्रहः - सर्वाङ्गपाठात् । यत्र न सर्वाङ्गोपदेशः सा विकृतिः । यथा सौर्यादिः । तत्र कतिपयाङ्गानामतिदेशेन प्राप्तत्वात् । अनारभ्यविधिः सामान्यविधिः । तदिदं वाक्यं प्रकरणादिभ्यो बलवत् । अत एव 'इन्द्राग्नी इदं हविः' इत्या- देरेकवाक्यत्वाद्दर्शाङ्गत्वं न तु प्रकरणाद्दर्शपूर्णमासाङ्गत्वम् । जहांपर सब अंगोंका उपदेश हो उसे प्रकृति याग कहते हैं। जैसे 'दर्शपूर्णमास' प्रभृति । क्योंकि दर्शपूर्णमास प्रकरणमें सभी अंगोंका पाठ है । और जिसमें सब अङ्गोंका उपदेश नहीं हो उसे विकृति याग कहते हैं। जैसे 'सौर्यादि' । सौर्ययागमें कितने अंगोंका 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या' इस अतिदेशसे ही लाभ होता है जैसे ल के स्थानमें तिप्का लाभ होता है। अनारभ्य विधिको सामान्य विधि कहते हैं। यह वाक्य प्रकरणादिसे बलवान् है। (अतएव) प्रकरणादिसे वाक्यको बलवान् होने के कारण ही 'इन्द्राग्नी इदं हविः' इत्यादि मंत्र एकवाक्यतासे दर्शका ही अङ्ग होता है किन्तु प्रकरणसे दर्शपूर्णमासका अंग नहीं होता। उसका यह अभिप्राय है कि सूक्त वाक्यके मन्त्र हैं- “अग्नीषोमाविदं हविरजुषेतामवीवृधेताम् महोज्यायोऽक्राताम्, इन्द्राग्नी इदं हविरजुषेतामवीवृधेतां महोज्यायोऽक्राताम्” इति । इन मन्त्रोंमें अग्नी- षोमादि रूप देवता वाचक पदका पौर्णमास्यादि कालमें देवताके अनुसार जिस समय में जो देवता हो उसका विभागकर प्रयोग करना चाहिये इस तरह तृतीयाध्यायमें वर्णित है । यहांपर यह संशय होता है कि दर्श और पूर्णमास इन दोनों प्रकरणोंमें यह मन्त्र है अतः देवतावाचक अग्नीषोमादि पदको हटाकर दोनों यागोंमें दोनों मन्त्रोंको पढ़ना चाहिये अथवा तत्तद्देवता वाचक पदोंके साथ एक वाक्यता से “अग्नीषोमौ इदं हविः” इत्यादि मन्त्रको पूर्णमासमें और “इन्द्राग्नी इदं हविः” इत्यादि मन्त्रको दर्शमें पढ़ना चाहिए ? इसपर पूर्वपक्ष होता है कि पूर्णमासमें इन्द्राग्नी पद हटाकर अवशिष्ट दोनों मन्त्रोंको और दर्शमें अग्नीषोमपद हटाकर अवशिष्ट दोनों मन्त्रोंको पढ़ना चाहिये । अतएव समस्त मन्त्र भागका दर्श और पूर्णमास प्रकरणमें पढ़ना चरितार्थ होता है। बादमें सिद्धान्त किया है कि “अग्नीषोमौ इदं हविः” इत्यादि मन्त्रमें अग्नीषोमपद रहित ( इदं हविः ) इत्यादि पदोंका इन्द्राग्नीपदोंके साथ अन्वयका श्रवण नहीं है इसलिये प्रकरणसे प्रथम दोनोंके अन्वय रूप वाक्यकी कल्पना करनी होगी उस वाक्यसे 'इन्द्राग्नी' प्रकाशन रूप सामर्थ्यकी कल्पना करनी होगी। बादमें उस लिंगसे 'इन्द्राग्नी' विष- यक कोई क्रिया करनी चाहिए ऐसी विनियोग बोधक श्रुतिकी कल्पना होगी। इस
दीपिकाटीकासहितः। ३१ तरह प्रकरण और श्रुतिके मध्यमें तीनका व्यवधान मानना होगा। जब तद्देवता वाचकपदोंकी एकवाक्यता मानते हैं तब वाक्य तो श्रूयमाण ही है केवल लिंग और श्रुतिकी ही कल्पना करनी पड़ती है अतः प्रकरणसे वाक्य बलवान है इसलिये ‘अग्नीषोमाविदं हविः’ यह मन्त्र पूर्णमासका अंग होता है और ‘इन्द्राग्नी इदं हविः’ इत्यादि मन्त्र दर्शका अंग होता है। प्रकरणनिरूपणम् । उभयाकाङ्क्षा प्रकरणम् । यथा प्रयाजादिषु ‘समिधो यजती’त्यादिवाक्ये फलविशेषस्यानिर्देशात्समिद्यागेन भावयेदिति बोधानन्तरं किमित्युप- कार्याकाङ्क्षा। दर्शपूर्णमासवाक्येऽपि ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गं भावये’दिति बोधानन्तरं कथमित्युपकारकाकाङ्क्षा। इत्थं चोभयाकाङ्क्षया प्रयाजादीनां दर्शपूर्णमासाङ्गत्वम्। प्रकरणद्वैविध्यम्। तच्च प्रकरणं द्विविधम्। महाप्रकरणमवान्तरप्रकरणं चेति। जहां उभय की आकांक्षा हो उसे प्रकरण कहते हैं। जैसे प्रयाजादि यागमें (समिधो यजति) इस वाक्यमें फल विशेष (स्वर्गादि) का निर्देश नहीं है इसलिये ‘समित् यागसे भावना करे’ इस तरह बोधके बाद किसकी भावना करे इस तरहसे (उपकार्य) फल की आकांक्षा होती है। एवं दर्शपूर्णमास वाक्यमें भी ‘दर्श और पूर्णमाससे स्वर्ग की भावना करे’ इस तरहसे बोधके बाद किस प्रकार स्वर्ग की भावना करे इस तरहसे (उपकार) अंग की आकांक्षा होती है। अतः उभय की आकांक्षासे प्रयाजादि याग, दर्श और पूर्णमासका अंग होता है। प्रकरण के दो भेद होते हैं। महाप्रकरण और अवान्तर प्रकरण। महाप्रकरणम्। तत्र मुख्यभावनासंबन्धिप्रकरणं महाप्रकरणम्। तेन च प्रयाजादीनां दर्शपूर्णमासाङ्गत्वम्। एतच्च प्रकृतावेव उभयाकाङ्क्षायाः संभवान्न तु विकृतौ। तत्र ‘प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या’ त्यतिदेशेन कथंभावाकाङ्क्षाया उपशमेना- पूर्वाङ्गानामप्युभयाकाङ्क्षया विनियोगासंभवात्। तस्मादपूर्वाङ्गानां स्थाना- देव विकृत्यर्थत्वमिति। उनमें मुख्य (स्वर्गादि फल) भावना सम्बन्धी प्रकरणको ही महाप्रकरण कहते हैं। इस महाप्रकरणसे प्रयाजादि में दर्श और पूर्णमासके प्रति अंगत्वका ज्ञान
३२ अर्थसंग्रहः— होता है। महाप्रकरण प्रकृति यागमें ही रहता है क्योंकि प्रकृति यागमें ही उभया- कांक्षा होती है। विकृति यागमें उभयाकांक्षा नहीं होती। क्योंकि विकृति यागमें ‘प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या’ इस अतिदेशसे ही (कथंभाव) इतिकर्त्तव्यता- कांक्षा शान्त हो जाती है अतः सौर्यादि विकृति यागमें अपूर्व (जो प्रकृति यागमें विहित नहीं है ऐसे) उपहोमका विनियोग उभयाकांक्षासे नहीं हो सकता है। इसलिये विकृति सौर्यादि यागमें अपूर्वहोमादि प्रकरणसे अंग नहीं होता है किन्तु स्थानाख्य प्रमाणसे ही वह विकृति सौर्यादिका अंग होता है। अवान्तरप्रकरणम्। अङ्गभावनासम्बन्धिप्रकरणमवान्तरप्रकरणम्। तेन चाभिक्रमणादीनां प्रयाजाद्यङ्गत्वम्। तच्च संदंशेनैव ज्ञायते। तदभावे चाविशेषात्सर्वेषां फलभावनाकथंभावेन ग्रहणप्रसङ्गेन प्रधानाङ्गत्वापत्तेः। अंगभावना सम्बन्धी प्रकरण को ही अवान्तर प्रकरण कहते हैं। अवान्तर प्रकरणसे प्रयाजादिके प्रति अभिक्रमणादि (भ्रमण करना) अंग होता है। अभि- क्रमणादिमें प्रयाजाद्यंगत्व का ज्ञान संदंश (दोके मध्यमें पाठ) से ही होता है। यदि संदंशके बिना भी ज्ञान हो तो जैसे दर्शादि प्रधान यागके प्रकरणमें पठित प्रयाजको प्रधानका अंगत्व होता है इसी तरह दर्शादि प्रकरणमें पठित अभिक्रमणको भी स्वर्गादि फल भावनामें कथंभावसे गृहीत होनेके कारण प्रधान (दर्श) का ही अंगत्व होगा। संदंश लक्षणम्। एकाङ्गानुवादेन विधीयमानयोरङ्गयोरन्तराले विहितत्वं संदंशः। यथाभिक्रमणे। तद् हि ‘समानयते जुह्वाम् उपभृतस्तेजो वा’ इत्यादिना प्रयाजानुवादेन किंचिदङ्गं विधाय विधीयते-‘यस्यैवंविदुषः प्रयाजा इज्यन्ते प्रेभ्यो लोकेभ्यो भ्रातृव्यानुदतेऽभिक्रामं जुहोत्यभिजित्यै’ इति, तदनन्तरं ‘यो वै प्रयाजानां मिथुनं वेद’ त्यादिना किंचिदङ्गं विधीयते। अतः प्रया- जाङ्गमध्ये विहितमभिक्रमणं तदङ्गम्। प्रयाजैरपूर्वं कृत्वा यागोपकारं भाव- येदिति ज्ञाते कथमेभिरपूर्वं कर्तव्यमिति कथंभावाकाङ्क्षायाः सत्त्वात्। सा च संदंशपठितैरभिक्रमणादिभिः शाम्यति। एक अंगका अनुवाद कर विधीयमान दो अंगोंके मध्यमें किया जानेवाला विधानको ही संदंश (सँडसीके सदृश) कहते हैं। जैसे अभिक्रमणमें प्रयाजरूप अंगका अनुवादकर
दीपिकाटीकासहितः । ३३ ‘समानयते जुहां’ ( उपभृत्नामक पात्र विशेषसे जुहूमें घृत लाता है ) इत्यादिसे घृतानयन रूप अंगका विधानकर ‘यस्यैवं विदुषः’ इस तरहसे प्रयाज याग करे तो शत्रुको जीतता है अतः—जयके लिये आहवनीय स्थलमें परितः भ्रमणकर याग करे इत्यादि अभिक्रमणरूप अंगका विधान है । उसके बाद ‘यो वै प्रयाजानां मिथुनं वेद’ ( जो इन दोनों प्रयाजों को जानता है ) इत्यादिसे प्रयाज द्वयके ज्ञान रूप अंगका विधान होता है । अतः प्रयाजके अनुवादसे घृतानयन और प्रयाजद्वय ज्ञानके मध्यमें विहित अभिक्रमण, संदंशसे प्रयाजका अंग होता है क्योंकि ‘प्रयाजसे अपूर्व- सम्पादनकर यागोपकारकी भावना करे’ ऐसा ज्ञान होनेपर कथंभाव ( कैसे किया जाय ) की आकांक्षा होती है । कथंभाव आकांक्षाकी शान्ति संदंश पठित अभिक्रमणादिसे ही होती है । न चाङ्गभावनायाः कथंभावाकाङ्क्षाऽभावः, भावनासामान्येन तत्रापि तत्संभवात् । यहाँपर यह शंका उठती है कि प्रयाजभावना अंगभावना है और अंगभावनामें कथंभावकी आकांक्षा नहीं होती है । अतः “अंगभावना कथंभावाकांक्षाशून्या, अंगभावनात्वात्’ इत्याकारक अनुमानसे अभिक्रमण प्रयाजका अंग कैसे होगा ? इसका उत्तर करते हैं कि भावनासामान्यसे अंगभावनामें भी साकांक्षत्वकी सिद्धि करेंगे । अर्थात् पूर्वपक्षीके अनुमानमें अंगभावनारूप हेतु पक्षमात्रमें वृत्ति है अतः असाधारण नामक व्यभिचार दोष लगता है । इसलिये “प्रयाजाद्यंगभावना कथंभावसाकांक्षा भावनात्वात् दर्शादिभावनावत्” ऐसे अनुमानसे कथंभाव-आकांक्षा की सिद्धि होगी । तदिदं प्रकरणं क्रियाया एव साक्षाद्विनियोजकं द्रव्यगुणयोस्तु तद्द्वारा । तथा हि—‘यजेत स्वर्गकाम’ इत्यत्र फलभावनायां कथंभावाकाङ्क्षायां संनि- धिपठिताऽश्रूयमाणफलं क्रियाजातमुपकार्याकाङ्क्षयेतिकर्तव्यतात्वेनान्वेति । क्रियाया एव लोके कथंभावाकाङ्क्षायामन्वयदर्शनात् । न हि कुठारेण छिन्द्यादित्यत्र कथंभावाकाङ्क्षोच्यायमानोऽपि हस्तोऽन्वेति किंतु हस्तेनो- द्यम्य निपात्येति उद्यमननिपातने एव, हस्तश्च तद्द्वारैवान्वेतीति सार्वज- नीनमेतत् । इस प्रकरणसे साक्षात् क्रियाका ही विनियोग होता है । द्रव्य और गुणका
३४ अर्थसंग्रहः— विनियोग तो क्रियाके द्वारा ही होता है। जैसे 'यजेत स्वर्गकामः' यहांपर फल (स्वर्ग) भावनामें कथंभावकी आकांक्षा होने पर समीप पठित अश्रूयमाण फल वाला क्रिया ( जात ) समूहका ही, उपकार्य ( इसका प्रधान कौन है ?. ) की आकांक्षासे अन्वय होता है। लोकमें भी कथंभाव ( इतिकर्तव्यता ) की आकांक्षा होनेपर क्रियाका ही अन्वय होता है जैसे 'हस्तेन कुठारेण छिन्द्यात्' यहांपर कुल्हारीसे छेदनकी भावना करे इस वाक्यार्थमें कथंभावकी आकांक्षा होनेपर यद्यपि हस्तका उच्चारण है तथापि उसका उस रूपसे अन्वय नहीं होता है किन्तु हाथसे उठाकर और गिराकर इस तरहसे उद्यमन और निपातन क्रियाका ही अन्वय होता है और हस्तका उद्यमनादि रूप क्रियाके द्वारा ही अन्वय होता है यही प्रतीति सर्वजन प्रसिद्ध है । इदं च स्थानादिभ्यो बलवत् । अत एवाक्षैर्दीव्यति राजन्यं जिना- तीति देवनादयो धर्मा अभिषेचनीयसंनिधौ पठिता अपि स्थानान्न तदङ्गं, किंतु प्रकरणाद्राजसूयाङ्गमिति । स्थानादिसे प्रकरण बलवान् है । इसलिए अभिषेचनीयके समीपमें पाठ होनेपर भी स्थानाख्य प्रमाणसे 'अक्षैर्दीव्यति' प्रभृति देवनादि ( पाशा खेलना ) धर्म अभिषेचनीयका अंग नहीं होता है किन्तु प्रकरणसे राजसूयका ही अंग होता है । उसका यह अभिप्राय है कि राजसूयके प्रकरणमें बहुतसे यागोंका पाठ है । जिनमें अभिषेचनीय ( सोमयाग ) नामका याग भी पठित है इसीके समीपमें 'अक्षैर्दी- व्यति' 'राजन्यो जिनाति' ( जीतता है ) इत्यादि मंत्रोंसे देवनादि धर्मका श्रवण है वहांपर यह संदेह होता है कि यह देवनादि राजसूयका अंग है अथवा अभिषेचनीय ( सोमयाग ) का अंग है ? उसपर पूर्वपक्ष होता है कि समान देशमें पाठ होनेसे स्थानाख्य प्रमाणके बलसे अभिषेचनीयका ही अंग होना चाहिये । तब सिद्धान्त करते हैं कि राजसूयमें कथंभावकी आकांक्षा होनेपर देवनादिका विधान है अतः देवनादि प्रकरणसे राजसूयका ही अंग होता है । और राजसूय बहुयागात्मक है अतः देवनादि वहांके सभी यागोंका अंग होगा । और देवनादिमें अभिषेचनीय की कोई आकांक्षा भी नहीं है क्योंकि अभिषेचनीय ज्योतिष्टोमका विकृति याग है अतः 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या' इस अतिदेशसे ही अभिषेचनीयकी आकांक्षा दूर हो जायगी ।
दीपिकाटीकासहितः । ३५ स्थाननिरूपणम् । देशसामान्यं स्थानम् । तद्द्विविधम्-पाठसादेश्यमनुष्ठानसादेश्यं चेति । स्थानं क्रमश्चेत्यनर्थान्तरम् । पाठसादेश्यमपि द्विविधम्—यथा- सङ्ख्यपाठः संनिधिपाठश्चेति । समान देश ( एक देश ) को ही स्थान कहते हैं । स्थानके दो भेद हैं । पाठ सादेश्य ( पाठ समान देशत्व ) और अनुष्ठान सादेश्य ( अनुष्ठान समान देशत्व ) । स्थान और क्रम दोनोंका एक ही अर्थ है । पाठ समान देशत्वके भी दो भेद हैं । यथासंख्य पाठ और सन्निधि पाठ । पाठसादेश्येन विनियोगः । तत्र 'ऐन्द्राग्नमेकादशकपालं निर्वपेत्' । 'वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपे- दि'त्येवं क्रमविहितेषु 'इन्द्राग्नी रोचना दिव' इत्यादीनां याज्यानुवाक्या- मन्त्राणां यथासंख्यं प्रथमस्य प्रथमं द्वितीयस्य द्वितीयमित्येवंरूपो विनि- योगो यथासंख्यपाठात् । प्रथमपठितमन्त्रस्य हि कैमर्थ्याकाङ्क्षायां प्रथमो विहितं कर्मैव प्रथममुपतिष्ठते समानदेशत्वात् । एवं द्वितीयमन्त्रस्यापि । वैकृताङ्गानां प्राकृताङ्गानुवादेन विहितानां संदंशपतितानां विकृत्यर्थत्वं संनिधिपाठात् यथा आमनहोमानाम् । तेषां हि कैमर्थ्याकाङ्क्षायां फलं विकृत्यपूर्वमेव भाव्यत्वेन संबध्यते, उपस्थितत्वात्, स्वतन्त्रफलकत्वे विकृतिसंनिधिपाठानर्थक्यापत्तेः । यथासंख्यपाठसे समान देशत्वका उदाहरण बतलाते हैं-क्रमसे 'ऐन्द्राग्न- मि'त्यादिसे ऐन्द्राग्नेष्टि याग और 'वैश्वानरमि'त्यादिसे वैश्वानरेष्टि यागका विधान है । एवं क्रमसे 'इन्द्राग्नी रोचना दिवः' और 'वैश्वानरोऽजीजनत्' यह याज्यानु- वाक्यामन्त्र ( 'यज' ऐसी विधिके बाद ब्रह्मा जिस मन्त्रका उच्चारण करें उसे अनुवाक्या मन्त्र कहते हैं ) का पाठ है । यहांपर यथासंख्य पाठसे प्रथम याग ( ऐन्द्राग्नेष्टि याग ) का प्रथम (इन्द्राग्नी रोचना दिवः) मंत्र अंग है और द्वितीय ( वैश्वानरेष्टि ) यागका द्वितीय ( वैश्वानरोऽजीजनत् ) मन्त्र अंग है । क्योंकि प्रथम पठित मन्त्रमें कैमर्थ्याकांक्षा ( यह मन्त्र क्यों है इस तरहसे आकांक्षा ) होने पर सामान्य देशत्वसे प्रथम विहित कर्म ( याग ) की ही उपस्थिति होती है । इसी तरहसे द्वितीय मन्त्रमें कैमर्थ्याकांक्षा होनेपर द्वितीय विहितकर्मकी उपस्थिति होती है । प्राकृतांग (प्रकृति यागका अंग) के अनुवादसे संदंशमें पठित जो वैकृतांग
३६ अर्थसंग्रहः— हैं वे सन्निधि पाठसे विकृतियागके अंग होते हैं । जैसे 'आमनसे स्वाहा' 'रेतस्विने स्वाहा' इत्यादि आमन होम हैं । आमन होममें कैमर्थ्याकांक्षा होने पर विकृति यागके अपूर्वफलका ही साध्यरूपसे उपस्थित होनेके कारण अन्वय होता है अर्थात् विकृति यागका फल ही आमनयागका फल है । क्योंकि आमन होमका अलग कोई फल हो तो विकृति सन्निधिमें उसका पाठ व्यर्थ हो जायगा । अनुष्ठानसादेश्येन विनियोगः । पशुधर्माणामग्नीषोमीयार्थत्वमनुष्ठानसादेश्यात् । औपवसथ्येऽह्नि अग्नीषोमीयः पशुरनुष्ठीयते तस्मिन्नेव दिने ते धर्माः पठ्यन्ते । अतस्तेषां कैमर्थ्याकाङ्क्षायामनुष्ठेयत्वेनोपस्थितं पश्वपूर्वमेव भाव्यत्वेन संबध्यते । पशुओंके जो उपाकरण ( 'प्रजापतेर्यजमानाः, इदं पशुम्'त्यादि दो मन्त्रोंसे स्पर्श करना ) पर्यग्निकरण ( कुशमें आग लगाकर उससे तीन वार पशुका प्रदक्षिण करना ) और यूपनियोजन ( यूपमें रज्जुसे बन्धन ) धर्म हैं । सब अनुष्ठान समानदेशत्वसे अग्निष्टोमीय पशुके अंग हैं । क्योंकि ज्योतिष्टोम प्रकरणमें तीन पशु कहे गये हैं—अग्निष्टोमीय, सवनीय और आनुबन्ध्य । उनमें अग्निष्टोमीय पशुका अनुष्ठान औपवसथ्य ( सौत्यनामक दिनसे पूर्व दिन ) में किया जाता है उसी दिनमें उपाकरणादि धर्मोंका कथन है । अतः उन धर्मोंमें कैमर्थ्याकांक्षा होनेपर अनुष्ठेयत्वेन उपस्थित अग्नीषोमीय पशुके अपूर्वका ही साध्यत्वेन अन्वय होगा, सवनीय और आनुबन्ध्यके अपूर्वका अन्वय नहीं होगा क्योंकि सवनीय पशुका पाठ सौत्य नामक दिनमें है और अवभृथ ( यज्ञान्त ) में आनुबन्ध्यके स्थानका श्रवण है । अतः एकदेशमें दोनोंके पाठ होनेके कारण उपाकरणादि अग्नीषोमीयार्थ ही है ॥ तच्च स्थानं समाख्यातः प्रबलम् । अत एव शुन्धनमन्त्रः सांनाव्यपात्राङ्गं पाठसादेश्यात् , न तु पौरोडाशिकमिति सामाख्यया पुरोडाशपात्राङ्गम् । यह स्थान समाख्यासे प्रबल है । इसलिये शुन्धन मंत्र, पाठ समानदेशत्वसे सान्नाय्य ( हविष् ) पात्रका अंग होता है किन्तु पौरोडाशिक, इस समाख्या ( यौगिक (शब्द) से पुरोडाश पात्रका अंग नहीं होता है । यहां पर यह विशद विचार है कि पौरोडाशिक, इस समाख्यात ( यौगिक ) काण्डमें सान्नाय्य पात्रका—"शुन्धध्वं दैव्याय कर्मणे देवयज्यायै" यह शुन्धन मंत्र है । इसमें यह संशय होता है कि
दीपिकाटीकासहितः । ३७ यह मंत्र सान्नाय्य पात्रका अङ्ग है अथवा पुरोडाश पात्रका ? इस पर पूर्वपक्ष होता है कि इस मंत्रका पौरोडाशिक-समाख्या काण्डमें पाठ है अतः पुरोडाश पात्रका अंग होना चाहिये बादमें यह सिद्धान्त होता है कि 'पौरोडाशिक' पदमें पुरोडाशस्येदं, इस विग्रहसे प्रकृतिका पुरोडाश और ठक् प्रत्ययका काण्ड अर्थ होता है । किन्तु इस योगार्थसे समस्त पुरोडाश पात्रकी सन्निधि ( क्रम ) प्रत्यक्ष नहीं है किन्तु अर्थापत्तिसे उसकी कल्पना करेंगे । लेकिन यदि पुरोडाश पात्रकी सन्निधि प्रत्यक्ष नहीं हो तो शुन्धन प्रतिपादक मंत्रकी पौरोडाशिक समाख्या नहीं हो सकती है । अतः काण्ड समाख्यासे सन्निधिकी कल्पना करेंगे किन्तु विना प्रकरणके परिकल्पित काण्ड सन्निधि अनुपपन्न है अतः परस्पर आकांक्षारूप समस्त पुरोडाश पात्र प्रकरणकी कल्पना करेंगे । उसके बाद वाक्य लिंग और श्रुतिकी कल्पना कर श्रुतिसे विनियोग करें तो समाख्यासे विनियोग बहुत व्यवहित हो जाता है । और सान्नाय्य पात्रोंकी शुन्धन-मंत्रसन्निधि प्रत्यक्ष सिद्ध है क्योंकि इध्माबर्हिष् सम्पादन और मुष्टि निर्वाप ( त्याग ) के मध्यमें सान्नाय्य पात्रोंका देश कहा है और इध्माबर्हिष् एवं निर्वाप विषयक जो मन्त्र और अनुवादक हैं उनके मध्यम अनुवाक्यमें मंत्रका पाठ है अतः मंत्र-सन्निधि प्रत्यक्ष सिद्ध है केवल प्रकरण वाक्य, लिंग और श्रुतिकी ही कल्पना करनी पड़ती है अतः सन्निधि ( स्थान ) के पास विनियोग है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि समाख्यासे स्थान प्रबल है ॥ समाख्यानिरूपणम् । समाख्या यौगिकः शब्दः । सा च द्विविधा—वैदिकी लौकिकी च । तत्र होतृचमसभक्षणाङ्गत्वम् , होतृचमस इति वैदिक्या समाख्यया । अध्वर्योस्तत्तत्पदार्थाङ्गत्वम् , लौकिक्या आध्वर्यवमिति समाख्ययेति संक्षेपः । तदेवं निरूपितानि संक्षेपतः श्रुत्यादीनि षट् प्रमाणानि । यौगिक शब्दोंको समाख्या कहते हैं । समाख्याके दो भेद हैं। वैदिकी और लौकिकी । उनमें 'होतृचमसः' इस वैदिकी समाख्यासे होता ( ऋचाको जानने वालेको होता कहते हैं ) चमस ( सोमरस ) भक्षणका अंग होता है । 'आध्वर्यवम्' इस लौकिकी समाख्यासे अध्वर्यु 'पुरोऽध्वर्युर्विभजति' इत्यादि यजुर्वेदसे विहित पदार्थोंका अंग होता है । इस तरह श्रुत्यादि छे प्रमाणोंका संक्षेपसे निरूपण हुआ ।
३८ : अर्थसंग्रहः - विनियोगविधिबोधिताङ्गानि । एतत्सहकृतेन विनियोगविधिना समिदादिभिरुपकृत्य 'दर्शपूर्ण- मासाभ्यां यजेते'त्येवंरूपेण यानि विनियोज्यन्ते तान्यङ्गानि द्विविधानि- सिद्धरूपाणि क्रियारूपाणि चेति । तत्र सिद्धानि जातिद्रव्यसंख्यादीनि । तानि च दृष्टार्थान्येव । क्रियारूपाणि च द्विविधानि—गुणकर्माणि प्रधान- कर्माणि च । एतान्येव संनिपत्योपकारकाणि आरादुपकारकाणीति चोच्यन्ते । इन श्रुत्यादियोंके सहारे विनियोग विधि द्वारा समिदादिसे उपकृत होकर 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत' इस तरह जिन अंगोंका विनियोग होता है वे अंग दो तरहके हैं सिद्धरूप और क्रियारूप । उनमें पशुत्वादिजाति व्रीह्यादिद्रव्य और एकत्वादि संख्या सिद्धरूप हैं । इनका दृष्ट ( दिखाई देने वाला ) ही प्रयोजन है । क्रियारूप अंगोंके दो भेद हैं गुणकर्म और प्रधानकर्म उनमें गुणकर्म अवघातादि ( कूटना ) और प्रधानकर्म प्रयाजादि हैं ये ही सन्निपत्योपकारक और आरा- दुपकारक भी क्रमशः कहे जाते हैं ॥ संनिपत्योपकारकाणि । कर्माङ्गद्रव्याद्युद्देशेन विधीयमानं कर्म संनिपत्योपकारकम् । यथाऽ- वघातप्रोक्षणादि । तच्च दृष्टार्थम् अदृष्टार्थम् दृष्टादृष्टार्थं चेति । तत्र दृष्टार्थ- मवघातादि, अदृष्टार्थं प्रोक्षणादि, दृष्टादृष्टार्थं पशुपुरोडाशादि । तद्धि- द्रव्यत्यागांशेनैव अदृष्टं देवतोद्देशेन च देवतास्मरणं दृष्टं करोति । होमकमांगद्रव्यादिको उद्देश्य करके विधीयमान जो कर्म उसे सन्निपत्योपकारक कहते हैं । अर्थात् जो अंग साक्षात् अथवा परम्परया स्वर्गादिफल साधक याग शरीर का निष्पादन करके याग द्वारा ( यागसे जायमान ) अपूर्वमें कारण हो उसे सन्निप- त्योपकारक कहते हैं । मूलोक्त द्रव्यादि पदमें आदि पदसे देवतादिका ग्रहण होता है । उदाहरण कहते हैं जैसे—अवघात और प्रोक्षणादि ( सेचन ) । उस सन्निप- त्योपकारकके तीन भेद हैं दृष्ट प्रयोजन, अदृष्ट प्रयोजन और दृष्टादृष्ट प्रयोजन । उनमें अवघातादिका तुषविमोकादि ( भूसा अलग करना ) दृष्ट प्रयोजन है क्योंकि उससे तण्डुलादि साफ हो जाता है । प्रोक्षणादिसे व्रीह्यादिमें अतिशय नामक संस्कार विशेषकी उत्पत्ति होती है अतः प्रोक्षणादिका यह अदृष्ट प्रयोजन है । पशु और पुरोडाशादिका दृष्टादृष्ट ये दोनों प्रयोजन हैं । क्योंकि पशुपुरोडा-