अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ अर्थसंग्रहः— विनियोग तो क्रियाके द्वारा ही होता है। जैसे 'यजेत स्वर्गकामः' यहांपर फल (स्वर्ग) भावनामें कथंभावकी आकांक्षा होने पर समीप पठित अश्रूयमाण फल वाला क्रिया ( जात ) समूहका ही, उपकार्य ( इसका प्रधान कौन है ?. ) की आकांक्षासे अन्वय होता है। लोकमें भी कथंभाव ( इतिकर्तव्यता ) की आकांक्षा होनेपर क्रियाका ही अन्वय होता है जैसे 'हस्तेन कुठारेण छिन्द्यात्' यहांपर कुल्हारीसे छेदनकी भावना करे इस वाक्यार्थमें कथंभावकी आकांक्षा होनेपर यद्यपि हस्तका उच्चारण है तथापि उसका उस रूपसे अन्वय नहीं होता है किन्तु हाथसे उठाकर और गिराकर इस तरहसे उद्यमन और निपातन क्रियाका ही अन्वय होता है और हस्तका उद्यमनादि रूप क्रियाके द्वारा ही अन्वय होता है यही प्रतीति सर्वजन प्रसिद्ध है । इदं च स्थानादिभ्यो बलवत् । अत एवाक्षैर्दीव्यति राजन्यं जिना- तीति देवनादयो धर्मा अभिषेचनीयसंनिधौ पठिता अपि स्थानान्न तदङ्गं, किंतु प्रकरणाद्राजसूयाङ्गमिति । स्थानादिसे प्रकरण बलवान् है । इसलिए अभिषेचनीयके समीपमें पाठ होनेपर भी स्थानाख्य प्रमाणसे 'अक्षैर्दीव्यति' प्रभृति देवनादि ( पाशा खेलना ) धर्म अभिषेचनीयका अंग नहीं होता है किन्तु प्रकरणसे राजसूयका ही अंग होता है । उसका यह अभिप्राय है कि राजसूयके प्रकरणमें बहुतसे यागोंका पाठ है । जिनमें अभिषेचनीय ( सोमयाग ) नामका याग भी पठित है इसीके समीपमें 'अक्षैर्दी- व्यति' 'राजन्यो जिनाति' ( जीतता है ) इत्यादि मंत्रोंसे देवनादि धर्मका श्रवण है वहांपर यह संदेह होता है कि यह देवनादि राजसूयका अंग है अथवा अभिषेचनीय ( सोमयाग ) का अंग है ? उसपर पूर्वपक्ष होता है कि समान देशमें पाठ होनेसे स्थानाख्य प्रमाणके बलसे अभिषेचनीयका ही अंग होना चाहिये । तब सिद्धान्त करते हैं कि राजसूयमें कथंभावकी आकांक्षा होनेपर देवनादिका विधान है अतः देवनादि प्रकरणसे राजसूयका ही अंग होता है । और राजसूय बहुयागात्मक है अतः देवनादि वहांके सभी यागोंका अंग होगा । और देवनादिमें अभिषेचनीय की कोई आकांक्षा भी नहीं है क्योंकि अभिषेचनीय ज्योतिष्टोमका विकृति याग है अतः 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या' इस अतिदेशसे ही अभिषेचनीयकी आकांक्षा दूर हो जायगी ।