अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ३३ ‘समानयते जुहां’ ( उपभृत्नामक पात्र विशेषसे जुहूमें घृत लाता है ) इत्यादिसे घृतानयन रूप अंगका विधानकर ‘यस्यैवं विदुषः’ इस तरहसे प्रयाज याग करे तो शत्रुको जीतता है अतः—जयके लिये आहवनीय स्थलमें परितः भ्रमणकर याग करे इत्यादि अभिक्रमणरूप अंगका विधान है । उसके बाद ‘यो वै प्रयाजानां मिथुनं वेद’ ( जो इन दोनों प्रयाजों को जानता है ) इत्यादिसे प्रयाज द्वयके ज्ञान रूप अंगका विधान होता है । अतः प्रयाजके अनुवादसे घृतानयन और प्रयाजद्वय ज्ञानके मध्यमें विहित अभिक्रमण, संदंशसे प्रयाजका अंग होता है क्योंकि ‘प्रयाजसे अपूर्व- सम्पादनकर यागोपकारकी भावना करे’ ऐसा ज्ञान होनेपर कथंभाव ( कैसे किया जाय ) की आकांक्षा होती है । कथंभाव आकांक्षाकी शान्ति संदंश पठित अभिक्रमणादिसे ही होती है । न चाङ्गभावनायाः कथंभावाकाङ्क्षाऽभावः, भावनासामान्येन तत्रापि तत्संभवात् । यहाँपर यह शंका उठती है कि प्रयाजभावना अंगभावना है और अंगभावनामें कथंभावकी आकांक्षा नहीं होती है । अतः “अंगभावना कथंभावाकांक्षाशून्या, अंगभावनात्वात्’ इत्याकारक अनुमानसे अभिक्रमण प्रयाजका अंग कैसे होगा ? इसका उत्तर करते हैं कि भावनासामान्यसे अंगभावनामें भी साकांक्षत्वकी सिद्धि करेंगे । अर्थात् पूर्वपक्षीके अनुमानमें अंगभावनारूप हेतु पक्षमात्रमें वृत्ति है अतः असाधारण नामक व्यभिचार दोष लगता है । इसलिये “प्रयाजाद्यंगभावना कथंभावसाकांक्षा भावनात्वात् दर्शादिभावनावत्” ऐसे अनुमानसे कथंभाव-आकांक्षा की सिद्धि होगी । तदिदं प्रकरणं क्रियाया एव साक्षाद्विनियोजकं द्रव्यगुणयोस्तु तद्द्वारा । तथा हि—‘यजेत स्वर्गकाम’ इत्यत्र फलभावनायां कथंभावाकाङ्क्षायां संनि- धिपठिताऽश्रूयमाणफलं क्रियाजातमुपकार्याकाङ्क्षयेतिकर्तव्यतात्वेनान्वेति । क्रियाया एव लोके कथंभावाकाङ्क्षायामन्वयदर्शनात् । न हि कुठारेण छिन्द्यादित्यत्र कथंभावाकाङ्क्षोच्यायमानोऽपि हस्तोऽन्वेति किंतु हस्तेनो- द्यम्य निपात्येति उद्यमननिपातने एव, हस्तश्च तद्द्वारैवान्वेतीति सार्वज- नीनमेतत् । इस प्रकरणसे साक्षात् क्रियाका ही विनियोग होता है । द्रव्य और गुणका