अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ अर्थसंग्रहः— होता है। महाप्रकरण प्रकृति यागमें ही रहता है क्योंकि प्रकृति यागमें ही उभया- कांक्षा होती है। विकृति यागमें उभयाकांक्षा नहीं होती। क्योंकि विकृति यागमें ‘प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या’ इस अतिदेशसे ही (कथंभाव) इतिकर्त्तव्यता- कांक्षा शान्त हो जाती है अतः सौर्यादि विकृति यागमें अपूर्व (जो प्रकृति यागमें विहित नहीं है ऐसे) उपहोमका विनियोग उभयाकांक्षासे नहीं हो सकता है। इसलिये विकृति सौर्यादि यागमें अपूर्वहोमादि प्रकरणसे अंग नहीं होता है किन्तु स्थानाख्य प्रमाणसे ही वह विकृति सौर्यादिका अंग होता है। अवान्तरप्रकरणम्। अङ्गभावनासम्बन्धिप्रकरणमवान्तरप्रकरणम्। तेन चाभिक्रमणादीनां प्रयाजाद्यङ्गत्वम्। तच्च संदंशेनैव ज्ञायते। तदभावे चाविशेषात्सर्वेषां फलभावनाकथंभावेन ग्रहणप्रसङ्गेन प्रधानाङ्गत्वापत्तेः। अंगभावना सम्बन्धी प्रकरण को ही अवान्तर प्रकरण कहते हैं। अवान्तर प्रकरणसे प्रयाजादिके प्रति अभिक्रमणादि (भ्रमण करना) अंग होता है। अभि- क्रमणादिमें प्रयाजाद्यंगत्व का ज्ञान संदंश (दोके मध्यमें पाठ) से ही होता है। यदि संदंशके बिना भी ज्ञान हो तो जैसे दर्शादि प्रधान यागके प्रकरणमें पठित प्रयाजको प्रधानका अंगत्व होता है इसी तरह दर्शादि प्रकरणमें पठित अभिक्रमणको भी स्वर्गादि फल भावनामें कथंभावसे गृहीत होनेके कारण प्रधान (दर्श) का ही अंगत्व होगा। संदंश लक्षणम्। एकाङ्गानुवादेन विधीयमानयोरङ्गयोरन्तराले विहितत्वं संदंशः। यथाभिक्रमणे। तद् हि ‘समानयते जुह्वाम् उपभृतस्तेजो वा’ इत्यादिना प्रयाजानुवादेन किंचिदङ्गं विधाय विधीयते-‘यस्यैवंविदुषः प्रयाजा इज्यन्ते प्रेभ्यो लोकेभ्यो भ्रातृव्यानुदतेऽभिक्रामं जुहोत्यभिजित्यै’ इति, तदनन्तरं ‘यो वै प्रयाजानां मिथुनं वेद’ त्यादिना किंचिदङ्गं विधीयते। अतः प्रया- जाङ्गमध्ये विहितमभिक्रमणं तदङ्गम्। प्रयाजैरपूर्वं कृत्वा यागोपकारं भाव- येदिति ज्ञाते कथमेभिरपूर्वं कर्तव्यमिति कथंभावाकाङ्क्षायाः सत्त्वात्। सा च संदंशपठितैरभिक्रमणादिभिः शाम्यति। एक अंगका अनुवाद कर विधीयमान दो अंगोंके मध्यमें किया जानेवाला विधानको ही संदंश (सँडसीके सदृश) कहते हैं। जैसे अभिक्रमणमें प्रयाजरूप अंगका अनुवादकर