भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

दीपिकाटीकासहितः। ३१ तरह प्रकरण और श्रुतिके मध्यमें तीनका व्यवधान मानना होगा। जब तद्देवता वाचकपदोंकी एकवाक्यता मानते हैं तब वाक्य तो श्रूयमाण ही है केवल लिंग और श्रुतिकी ही कल्पना करनी पड़ती है अतः प्रकरणसे वाक्य बलवान है इसलिये ‘अग्नीषोमाविदं हविः’ यह मन्त्र पूर्णमासका अंग होता है और ‘इन्द्राग्नी इदं हविः’ इत्यादि मन्त्र दर्शका अंग होता है। प्रकरणनिरूपणम् । उभयाकाङ्क्षा प्रकरणम् । यथा प्रयाजादिषु ‘समिधो यजती’त्यादिवाक्ये फलविशेषस्यानिर्देशात्समिद्यागेन भावयेदिति बोधानन्तरं किमित्युप- कार्याकाङ्क्षा। दर्शपूर्णमासवाक्येऽपि ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गं भावये’दिति बोधानन्तरं कथमित्युपकारकाकाङ्क्षा। इत्थं चोभयाकाङ्क्षया प्रयाजादीनां दर्शपूर्णमासाङ्गत्वम्। प्रकरणद्वैविध्यम्। तच्च प्रकरणं द्विविधम्। महाप्रकरणमवान्तरप्रकरणं चेति। जहां उभय की आकांक्षा हो उसे प्रकरण कहते हैं। जैसे प्रयाजादि यागमें (समिधो यजति) इस वाक्यमें फल विशेष (स्वर्गादि) का निर्देश नहीं है इसलिये ‘समित् यागसे भावना करे’ इस तरह बोधके बाद किसकी भावना करे इस तरहसे (उपकार्य) फल की आकांक्षा होती है। एवं दर्शपूर्णमास वाक्यमें भी ‘दर्श और पूर्णमाससे स्वर्ग की भावना करे’ इस तरहसे बोधके बाद किस प्रकार स्वर्ग की भावना करे इस तरहसे (उपकार) अंग की आकांक्षा होती है। अतः उभय की आकांक्षासे प्रयाजादि याग, दर्श और पूर्णमासका अंग होता है। प्रकरण के दो भेद होते हैं। महाप्रकरण और अवान्तर प्रकरण। महाप्रकरणम्। तत्र मुख्यभावनासंबन्धिप्रकरणं महाप्रकरणम्। तेन च प्रयाजादीनां दर्शपूर्णमासाङ्गत्वम्। एतच्च प्रकृतावेव उभयाकाङ्क्षायाः संभवान्न तु विकृतौ। तत्र ‘प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या’ त्यतिदेशेन कथंभावाकाङ्क्षाया उपशमेना- पूर्वाङ्गानामप्युभयाकाङ्क्षया विनियोगासंभवात्। तस्मादपूर्वाङ्गानां स्थाना- देव विकृत्यर्थत्वमिति। उनमें मुख्य (स्वर्गादि फल) भावना सम्बन्धी प्रकरणको ही महाप्रकरण कहते हैं। इस महाप्रकरणसे प्रयाजादि में दर्श और पूर्णमासके प्रति अंगत्वका ज्ञान