भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

३० अर्थसंग्रहः - सर्वाङ्गपाठात् । यत्र न सर्वाङ्गोपदेशः सा विकृतिः । यथा सौर्यादिः । तत्र कतिपयाङ्गानामतिदेशेन प्राप्तत्वात् । अनारभ्यविधिः सामान्यविधिः । तदिदं वाक्यं प्रकरणादिभ्यो बलवत् । अत एव 'इन्द्राग्नी इदं हविः' इत्या- देरेकवाक्यत्वाद्दर्शाङ्गत्वं न तु प्रकरणाद्दर्शपूर्णमासाङ्गत्वम् । जहांपर सब अंगोंका उपदेश हो उसे प्रकृति याग कहते हैं। जैसे 'दर्शपूर्णमास' प्रभृति । क्योंकि दर्शपूर्णमास प्रकरणमें सभी अंगोंका पाठ है । और जिसमें सब अङ्गोंका उपदेश नहीं हो उसे विकृति याग कहते हैं। जैसे 'सौर्यादि' । सौर्ययागमें कितने अंगोंका 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या' इस अतिदेशसे ही लाभ होता है जैसे ल के स्थानमें तिप्का लाभ होता है। अनारभ्य विधिको सामान्य विधि कहते हैं। यह वाक्य प्रकरणादिसे बलवान् है। (अतएव) प्रकरणादिसे वाक्यको बलवान् होने के कारण ही 'इन्द्राग्नी इदं हविः' इत्यादि मंत्र एकवाक्यतासे दर्शका ही अङ्ग होता है किन्तु प्रकरणसे दर्शपूर्णमासका अंग नहीं होता। उसका यह अभिप्राय है कि सूक्त वाक्यके मन्त्र हैं- “अग्नीषोमाविदं हविरजुषेतामवीवृधेताम् महोज्यायोऽक्राताम्, इन्द्राग्नी इदं हविरजुषेतामवीवृधेतां महोज्यायोऽक्राताम्” इति । इन मन्त्रोंमें अग्नी- षोमादि रूप देवता वाचक पदका पौर्णमास्यादि कालमें देवताके अनुसार जिस समय में जो देवता हो उसका विभागकर प्रयोग करना चाहिये इस तरह तृतीयाध्यायमें वर्णित है । यहांपर यह संशय होता है कि दर्श और पूर्णमास इन दोनों प्रकरणोंमें यह मन्त्र है अतः देवतावाचक अग्नीषोमादि पदको हटाकर दोनों यागोंमें दोनों मन्त्रोंको पढ़ना चाहिये अथवा तत्तद्देवता वाचक पदोंके साथ एक वाक्यता से “अग्नीषोमौ इदं हविः” इत्यादि मन्त्रको पूर्णमासमें और “इन्द्राग्नी इदं हविः” इत्यादि मन्त्रको दर्शमें पढ़ना चाहिए ? इसपर पूर्वपक्ष होता है कि पूर्णमासमें इन्द्राग्नी पद हटाकर अवशिष्ट दोनों मन्त्रोंको और दर्शमें अग्नीषोमपद हटाकर अवशिष्ट दोनों मन्त्रोंको पढ़ना चाहिये । अतएव समस्त मन्त्र भागका दर्श और पूर्णमास प्रकरणमें पढ़ना चरितार्थ होता है। बादमें सिद्धान्त किया है कि “अग्नीषोमौ इदं हविः” इत्यादि मन्त्रमें अग्नीषोमपद रहित ( इदं हविः ) इत्यादि पदोंका इन्द्राग्नीपदोंके साथ अन्वयका श्रवण नहीं है इसलिये प्रकरणसे प्रथम दोनोंके अन्वय रूप वाक्यकी कल्पना करनी होगी उस वाक्यसे 'इन्द्राग्नी' प्रकाशन रूप सामर्थ्यकी कल्पना करनी होगी। बादमें उस लिंगसे 'इन्द्राग्नी' विष- यक कोई क्रिया करनी चाहिए ऐसी विनियोग बोधक श्रुतिकी कल्पना होगी। इस