अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । [२९] पदोंका एक साथ उच्चारण को समभिव्याहार (वाक्य) कहते हैं । उदाहरण बतलाते हैं जैसे 'पर्णमयी जुहूः' इत्यादि । यहांपर पर्णता ( पलाश ) और जुहूका एक साथ उच्चारण है इसलिये पर्णता जुहूकी अंग होती है । यहां यह शंका उठती है कि दूसरे काष्ठसे भी जुहू ( अर्धचन्द्राकृति यज्ञ पात्र विशेष ) हो सकती है अतः पर्णताका उपादान व्यर्थ है इसका उत्तर देते हैं कि जुहू शब्दको जुहू साध्य अपूर्व में लक्षणा करते हैं । अर्थात् पर्णतासे बनाई गई जुहूसे ही अपूर्वकी उत्पत्ति होती है काष्ठान्तर निर्मित जुहूसे अपूर्वकी उत्पत्ति नहीं होती है । तथा च वाक्यार्थः पर्णतायावत्तहविर्धारणद्वारा जुह्वपूर्व भावयेदिति । एवं च पर्णतया यदि जुहूः क्रियते तदैव तत्साध्यमपूर्व भवति नान्यथेति गम्यत इति न पर्णताया वैयर्थ्यम् । अवत्तहविर्धारणद्वारेति चावश्यं वक्तव्यम् । अन्यथा स्रुवादिष्वपि पर्णतापत्तेः, सेयं पर्णता अनारभ्याधी- तापि सर्वप्रकृतिष्वेवान्वेति न विकृतिषु । तत्र चोदकेनापि तत्प्राप्तिसंभवा- त्पौनरुक्त्यापत्तेः । जुहूकी जुहू साध्य अपूर्वमें लक्षणा करने पर जो वाक्यार्थ होता है उसको बतलाते हैं "अवत्त ( खण्डशः कृत्वा गृहीत ) हविर्धारणद्वारा पर्णता (पलाश) निर्मित पात्र विशेषसे जुहूसाध्य अपूर्वकी भावना करे" यह वाक्यका अर्थ होगा । अर्थात् पर्णतानिर्मित जुहूमें खण्डशः कृत चरु आदि हविष लेकर यज्ञ करे । इसलिये जब पर्णतासे जुहू की जायगी तभी जुहू साध्य अपूर्व होगा अन्यथा नहीं यह सिद्ध हुआ अतः पर्णताका वैयर्थ्य नहीं हुआ । अवत्त हविर्धारण द्वारा यह अर्थ करना ही पड़ेगा । अन्यथा स्रुवादि भी आज्य हविर्धारण द्वारा जुहू साध्य अपूर्वका उपकारक होता है अतः उसमें भी पर्णताकी आपत्ति होगी । अर्थात् स्रुवादि भी पलाशका ही बनाना पड़ेगा । इस पर्णताका ( अनारभ्याधीता ) सामान्य विधान होनेपर भी सब प्रकृति यज्ञमें ही अन्वय होगा किन्तु विकृति यज्ञमें अन्वय नहीं होगा । क्योंकि विकृति यज्ञमें 'प्रकृतिवद्विकृतिः कर्तव्या' ( प्रकृतिके समान विकृति करनी चाहिये ) इस चोदक वाक्यसे ही पर्णताकी प्राप्ति है अतः विकृति यागमें पर्णताका अन्वय करेंगे तो पुनरुक्ति दोष होने लगेगा अतः विकृति यागमें पर्णताका अन्वय नहीं करना चाहिये । प्रकृतिविकृतिलक्षणम् । यत्र समग्राङ्गोपदेशः सा प्रकृतिः, यथा दर्शपूर्णमासादिः । तत्प्रकरणे