अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ अर्थसंग्रहः— पुरोडाश । इस ( अमृत ) अच्छे स्थानमें तुम ( सुमनस्यमानः ) समाहित चित्तसे ( सीद ) बैठो और ( प्रतिष्ठ ) स्थिर रहो । यहांपर यह सन्देह उपस्थित होता है कि इस समस्त मन्त्रमें स्थानकरणांगत्व और पुरोडाश स्थापनाङ्गत्व है अथवा “स्योनं ते सदनं कृणोमि” यह स्थानकरणका अंग है और ‘घृतस्य धारया’ इत्यादि मन्त्र पुरोडाश स्थापनका अंग है ऐसा संशय होनेपर पूर्वपक्ष होता है कि यह एक ही मन्त्र है इसलिये सम्पूर्ण मन्त्र ही स्थानकरणका और पुरोडाश स्थापनका अंग है । अर्थात् ( सर्वेणानेन मन्त्रेण स्थानं कर्तव्यम् ) इस समस्त मन्त्रसे स्थान करना चाहिए एवं ( सर्वेण मन्त्रेण पुरोडाशः स्थापनीयः ) समस्त मन्त्रसे पुरोडाश स्थापन करना चाहिये इस तरहसे विनि- योजकश्रुति की कल्पना करनी चाहिये क्योंकि इस मन्त्रमें स्थान करण प्रकाशन सामर्थ्यके समान पुरोडाश स्थापन प्रकाशन सामर्थ्य भी है । अब यहांपर यह सिद्धान्त है कि प्रत्यक्ष लिंगसे पूर्वार्द्ध सदन करणका अंग है और उत्तरार्द्ध पुरोडाश स्थापनका अंग है । क्योंकि पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धमें परस्पर अन्वयसे जो एक- वाक्यता होती है उसीसे समस्त मंत्रमें स्थान करणांगत्व और पुरोडाश स्थाप- नांगत्व ये दोनों हो सकते हैं। और ये भी दोनों पुरोडाश स्थापनमें पूर्वार्द्ध की शक्ति कल्पनाके बिना और सदन करणमें उत्तरार्द्ध की शक्ति कल्पनाके बिना नहीं हो सकते, अतः लिंग की कल्पना करनी होगी । इसलिये श्रुतिके प्रति लिंग कल्पनासे वाक्य व्यवहित हो जाता है और पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्धमें जो दोनों प्रत्यक्ष लिंग हैं वे श्रुतिके प्रति व्यवहित नहीं हैं। अतः वाक्यसे लिंग प्रबल हुआ इसलिये लिंग द्वारा पूर्वार्द्धसे सदन करणका और उत्तरार्द्धसे पुरोडाश स्थापनका विनियोगमें कोई प्रतिबन्धक नहीं है । वाक्यनिर्वचनम । समभिव्याहारो वाक्यम् । समभिव्याहारश्च साध्यत्वादिवाचकद्विती- याद्यभावेऽपि । वस्तुतः शेषशेषिवाचकपदयोः सहोच्चारणम् । यथा ‘यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापँ श्लोकं शृणोति’ । अत्र पर्णताजुह्वोः सम- भिव्याहारादेव पर्णताया जुह्वङ्गत्वम् । न चानर्थक्यम् , अन्यथापि जुह्वाः सिद्धत्वादिति वाच्यम् । जुहूशब्देन तत्साध्यापूर्वलक्षणात् । समभिव्याहार को वाक्य कहते हैं । साध्यत्वादिवाचक द्वितीयादि नहीं रहने पर भी समभिव्याहार रहता है । वस्तुतः शेष (अंग) और शेषी (प्रधान) अङ्गी वाचक-