अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ३५ स्थाननिरूपणम् । देशसामान्यं स्थानम् । तद्द्विविधम्-पाठसादेश्यमनुष्ठानसादेश्यं चेति । स्थानं क्रमश्चेत्यनर्थान्तरम् । पाठसादेश्यमपि द्विविधम्—यथा- सङ्ख्यपाठः संनिधिपाठश्चेति । समान देश ( एक देश ) को ही स्थान कहते हैं । स्थानके दो भेद हैं । पाठ सादेश्य ( पाठ समान देशत्व ) और अनुष्ठान सादेश्य ( अनुष्ठान समान देशत्व ) । स्थान और क्रम दोनोंका एक ही अर्थ है । पाठ समान देशत्वके भी दो भेद हैं । यथासंख्य पाठ और सन्निधि पाठ । पाठसादेश्येन विनियोगः । तत्र 'ऐन्द्राग्नमेकादशकपालं निर्वपेत्' । 'वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपे- दि'त्येवं क्रमविहितेषु 'इन्द्राग्नी रोचना दिव' इत्यादीनां याज्यानुवाक्या- मन्त्राणां यथासंख्यं प्रथमस्य प्रथमं द्वितीयस्य द्वितीयमित्येवंरूपो विनि- योगो यथासंख्यपाठात् । प्रथमपठितमन्त्रस्य हि कैमर्थ्याकाङ्क्षायां प्रथमो विहितं कर्मैव प्रथममुपतिष्ठते समानदेशत्वात् । एवं द्वितीयमन्त्रस्यापि । वैकृताङ्गानां प्राकृताङ्गानुवादेन विहितानां संदंशपतितानां विकृत्यर्थत्वं संनिधिपाठात् यथा आमनहोमानाम् । तेषां हि कैमर्थ्याकाङ्क्षायां फलं विकृत्यपूर्वमेव भाव्यत्वेन संबध्यते, उपस्थितत्वात्, स्वतन्त्रफलकत्वे विकृतिसंनिधिपाठानर्थक्यापत्तेः । यथासंख्यपाठसे समान देशत्वका उदाहरण बतलाते हैं-क्रमसे 'ऐन्द्राग्न- मि'त्यादिसे ऐन्द्राग्नेष्टि याग और 'वैश्वानरमि'त्यादिसे वैश्वानरेष्टि यागका विधान है । एवं क्रमसे 'इन्द्राग्नी रोचना दिवः' और 'वैश्वानरोऽजीजनत्' यह याज्यानु- वाक्यामन्त्र ( 'यज' ऐसी विधिके बाद ब्रह्मा जिस मन्त्रका उच्चारण करें उसे अनुवाक्या मन्त्र कहते हैं ) का पाठ है । यहांपर यथासंख्य पाठसे प्रथम याग ( ऐन्द्राग्नेष्टि याग ) का प्रथम (इन्द्राग्नी रोचना दिवः) मंत्र अंग है और द्वितीय ( वैश्वानरेष्टि ) यागका द्वितीय ( वैश्वानरोऽजीजनत् ) मन्त्र अंग है । क्योंकि प्रथम पठित मन्त्रमें कैमर्थ्याकांक्षा ( यह मन्त्र क्यों है इस तरहसे आकांक्षा ) होने पर सामान्य देशत्वसे प्रथम विहित कर्म ( याग ) की ही उपस्थिति होती है । इसी तरहसे द्वितीय मन्त्रमें कैमर्थ्याकांक्षा होनेपर द्वितीय विहितकर्मकी उपस्थिति होती है । प्राकृतांग (प्रकृति यागका अंग) के अनुवादसे संदंशमें पठित जो वैकृतांग