अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ अर्थसंग्रहः— हैं वे सन्निधि पाठसे विकृतियागके अंग होते हैं । जैसे 'आमनसे स्वाहा' 'रेतस्विने स्वाहा' इत्यादि आमन होम हैं । आमन होममें कैमर्थ्याकांक्षा होने पर विकृति यागके अपूर्वफलका ही साध्यरूपसे उपस्थित होनेके कारण अन्वय होता है अर्थात् विकृति यागका फल ही आमनयागका फल है । क्योंकि आमन होमका अलग कोई फल हो तो विकृति सन्निधिमें उसका पाठ व्यर्थ हो जायगा । अनुष्ठानसादेश्येन विनियोगः । पशुधर्माणामग्नीषोमीयार्थत्वमनुष्ठानसादेश्यात् । औपवसथ्येऽह्नि अग्नीषोमीयः पशुरनुष्ठीयते तस्मिन्नेव दिने ते धर्माः पठ्यन्ते । अतस्तेषां कैमर्थ्याकाङ्क्षायामनुष्ठेयत्वेनोपस्थितं पश्वपूर्वमेव भाव्यत्वेन संबध्यते । पशुओंके जो उपाकरण ( 'प्रजापतेर्यजमानाः, इदं पशुम्'त्यादि दो मन्त्रोंसे स्पर्श करना ) पर्यग्निकरण ( कुशमें आग लगाकर उससे तीन वार पशुका प्रदक्षिण करना ) और यूपनियोजन ( यूपमें रज्जुसे बन्धन ) धर्म हैं । सब अनुष्ठान समानदेशत्वसे अग्निष्टोमीय पशुके अंग हैं । क्योंकि ज्योतिष्टोम प्रकरणमें तीन पशु कहे गये हैं—अग्निष्टोमीय, सवनीय और आनुबन्ध्य । उनमें अग्निष्टोमीय पशुका अनुष्ठान औपवसथ्य ( सौत्यनामक दिनसे पूर्व दिन ) में किया जाता है उसी दिनमें उपाकरणादि धर्मोंका कथन है । अतः उन धर्मोंमें कैमर्थ्याकांक्षा होनेपर अनुष्ठेयत्वेन उपस्थित अग्नीषोमीय पशुके अपूर्वका ही साध्यत्वेन अन्वय होगा, सवनीय और आनुबन्ध्यके अपूर्वका अन्वय नहीं होगा क्योंकि सवनीय पशुका पाठ सौत्य नामक दिनमें है और अवभृथ ( यज्ञान्त ) में आनुबन्ध्यके स्थानका श्रवण है । अतः एकदेशमें दोनोंके पाठ होनेके कारण उपाकरणादि अग्नीषोमीयार्थ ही है ॥ तच्च स्थानं समाख्यातः प्रबलम् । अत एव शुन्धनमन्त्रः सांनाव्यपात्राङ्गं पाठसादेश्यात् , न तु पौरोडाशिकमिति सामाख्यया पुरोडाशपात्राङ्गम् । यह स्थान समाख्यासे प्रबल है । इसलिये शुन्धन मंत्र, पाठ समानदेशत्वसे सान्नाय्य ( हविष् ) पात्रका अंग होता है किन्तु पौरोडाशिक, इस समाख्या ( यौगिक (शब्द) से पुरोडाश पात्रका अंग नहीं होता है । यहां पर यह विशद विचार है कि पौरोडाशिक, इस समाख्यात ( यौगिक ) काण्डमें सान्नाय्य पात्रका—"शुन्धध्वं दैव्याय कर्मणे देवयज्यायै" यह शुन्धन मंत्र है । इसमें यह संशय होता है कि