भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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दीपिकाटीकासहितः । ३७ यह मंत्र सान्नाय्य पात्रका अङ्ग है अथवा पुरोडाश पात्रका ? इस पर पूर्वपक्ष होता है कि इस मंत्रका पौरोडाशिक-समाख्या काण्डमें पाठ है अतः पुरोडाश पात्रका अंग होना चाहिये बादमें यह सिद्धान्त होता है कि 'पौरोडाशिक' पदमें पुरोडाशस्येदं, इस विग्रहसे प्रकृतिका पुरोडाश और ठक् प्रत्ययका काण्ड अर्थ होता है । किन्तु इस योगार्थसे समस्त पुरोडाश पात्रकी सन्निधि ( क्रम ) प्रत्यक्ष नहीं है किन्तु अर्थापत्तिसे उसकी कल्पना करेंगे । लेकिन यदि पुरोडाश पात्रकी सन्निधि प्रत्यक्ष नहीं हो तो शुन्धन प्रतिपादक मंत्रकी पौरोडाशिक समाख्या नहीं हो सकती है । अतः काण्ड समाख्यासे सन्निधिकी कल्पना करेंगे किन्तु विना प्रकरणके परिकल्पित काण्ड सन्निधि अनुपपन्न है अतः परस्पर आकांक्षारूप समस्त पुरोडाश पात्र प्रकरणकी कल्पना करेंगे । उसके बाद वाक्य लिंग और श्रुतिकी कल्पना कर श्रुतिसे विनियोग करें तो समाख्यासे विनियोग बहुत व्यवहित हो जाता है । और सान्नाय्य पात्रोंकी शुन्धन-मंत्रसन्निधि प्रत्यक्ष सिद्ध है क्योंकि इध्माबर्हिष् सम्पादन और मुष्टि निर्वाप ( त्याग ) के मध्यमें सान्नाय्य पात्रोंका देश कहा है और इध्माबर्हिष् एवं निर्वाप विषयक जो मन्त्र और अनुवादक हैं उनके मध्यम अनुवाक्यमें मंत्रका पाठ है अतः मंत्र-सन्निधि प्रत्यक्ष सिद्ध है केवल प्रकरण वाक्य, लिंग और श्रुतिकी ही कल्पना करनी पड़ती है अतः सन्निधि ( स्थान ) के पास विनियोग है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि समाख्यासे स्थान प्रबल है ॥ समाख्यानिरूपणम् । समाख्या यौगिकः शब्दः । सा च द्विविधा—वैदिकी लौकिकी च । तत्र होतृचमसभक्षणाङ्गत्वम् , होतृचमस इति वैदिक्या समाख्यया । अध्वर्योस्तत्तत्पदार्थाङ्गत्वम् , लौकिक्या आध्वर्यवमिति समाख्ययेति संक्षेपः । तदेवं निरूपितानि संक्षेपतः श्रुत्यादीनि षट् प्रमाणानि । यौगिक शब्दोंको समाख्या कहते हैं । समाख्याके दो भेद हैं। वैदिकी और लौकिकी । उनमें 'होतृचमसः' इस वैदिकी समाख्यासे होता ( ऋचाको जानने वालेको होता कहते हैं ) चमस ( सोमरस ) भक्षणका अंग होता है । 'आध्वर्यवम्' इस लौकिकी समाख्यासे अध्वर्यु 'पुरोऽध्वर्युर्विभजति' इत्यादि यजुर्वेदसे विहित पदार्थोंका अंग होता है । इस तरह श्रुत्यादि छे प्रमाणोंका संक्षेपसे निरूपण हुआ ।