अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ : अर्थसंग्रहः - विनियोगविधिबोधिताङ्गानि । एतत्सहकृतेन विनियोगविधिना समिदादिभिरुपकृत्य 'दर्शपूर्ण- मासाभ्यां यजेते'त्येवंरूपेण यानि विनियोज्यन्ते तान्यङ्गानि द्विविधानि- सिद्धरूपाणि क्रियारूपाणि चेति । तत्र सिद्धानि जातिद्रव्यसंख्यादीनि । तानि च दृष्टार्थान्येव । क्रियारूपाणि च द्विविधानि—गुणकर्माणि प्रधान- कर्माणि च । एतान्येव संनिपत्योपकारकाणि आरादुपकारकाणीति चोच्यन्ते । इन श्रुत्यादियोंके सहारे विनियोग विधि द्वारा समिदादिसे उपकृत होकर 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत' इस तरह जिन अंगोंका विनियोग होता है वे अंग दो तरहके हैं सिद्धरूप और क्रियारूप । उनमें पशुत्वादिजाति व्रीह्यादिद्रव्य और एकत्वादि संख्या सिद्धरूप हैं । इनका दृष्ट ( दिखाई देने वाला ) ही प्रयोजन है । क्रियारूप अंगोंके दो भेद हैं गुणकर्म और प्रधानकर्म उनमें गुणकर्म अवघातादि ( कूटना ) और प्रधानकर्म प्रयाजादि हैं ये ही सन्निपत्योपकारक और आरा- दुपकारक भी क्रमशः कहे जाते हैं ॥ संनिपत्योपकारकाणि । कर्माङ्गद्रव्याद्युद्देशेन विधीयमानं कर्म संनिपत्योपकारकम् । यथाऽ- वघातप्रोक्षणादि । तच्च दृष्टार्थम् अदृष्टार्थम् दृष्टादृष्टार्थं चेति । तत्र दृष्टार्थ- मवघातादि, अदृष्टार्थं प्रोक्षणादि, दृष्टादृष्टार्थं पशुपुरोडाशादि । तद्धि- द्रव्यत्यागांशेनैव अदृष्टं देवतोद्देशेन च देवतास्मरणं दृष्टं करोति । होमकमांगद्रव्यादिको उद्देश्य करके विधीयमान जो कर्म उसे सन्निपत्योपकारक कहते हैं । अर्थात् जो अंग साक्षात् अथवा परम्परया स्वर्गादिफल साधक याग शरीर का निष्पादन करके याग द्वारा ( यागसे जायमान ) अपूर्वमें कारण हो उसे सन्निप- त्योपकारक कहते हैं । मूलोक्त द्रव्यादि पदमें आदि पदसे देवतादिका ग्रहण होता है । उदाहरण कहते हैं जैसे—अवघात और प्रोक्षणादि ( सेचन ) । उस सन्निप- त्योपकारकके तीन भेद हैं दृष्ट प्रयोजन, अदृष्ट प्रयोजन और दृष्टादृष्ट प्रयोजन । उनमें अवघातादिका तुषविमोकादि ( भूसा अलग करना ) दृष्ट प्रयोजन है क्योंकि उससे तण्डुलादि साफ हो जाता है । प्रोक्षणादिसे व्रीह्यादिमें अतिशय नामक संस्कार विशेषकी उत्पत्ति होती है अतः प्रोक्षणादिका यह अदृष्ट प्रयोजन है । पशु और पुरोडाशादिका दृष्टादृष्ट ये दोनों प्रयोजन हैं । क्योंकि पशुपुरोडा-